नई दिल्ली, प्रेट्र: सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को कहा कि पर्यावरण संरक्षण कानून में पूर्व तिथि से पर्यावरण मंजूरी प्रदान करने पर रोक नहीं है और प्रासंगिक पर्यावरणीय कारकों पर गौर करते हुए असाधारण परिस्थितियों में इसे प्रदान किया जा सकता है। जस्टिस इंदिरा बनर्जी और जस्टिस जेके महेश्वरी की पीठ ने कहा कि अदालतें आर्थिकी या इकाइयों में कार्यरत सैकड़ों कर्मचारियों व अन्य की आजीविका के संरक्षण की जरूरत और अपने जीवन के लिए इकाइयों पर निर्भर लोगों से बेखबर नहीं रह सकतीं।

एनजीटी के आदेश को कोर्ट ने रखा बरकरार

पीठ ने कहा, 'जहां पूर्व तिथि से अनुमति देने से इन्कार के दुष्प्रभाव की अपेक्षा पूर्व तिथि से मंजूरी देने के परिणाम बेहतर हों तो वहां कानून के मुताबिक पूर्व तिथि से मंजूरी दी जानी चाहिए।' शीर्ष कोर्ट ने यह टिप्पणी नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (एनजीटी) के एक आदेश को बरकरार रखते हुए की जिसने उस याचिका को खारिज कर दिया था जिसमें सार्वजनिक जैव-चिकित्सकीय कचरा निस्तारण केंद्र को बंद करने के निर्देश देने की मांग की गई थी। इसके लिए याचिका में पर्यावरण प्रभाव मूल्यांकन अधिसूचना, 2006 के प्रविधानों के कथित गैर-अनुपालन को आधार बनाया गया था।

प्रदूषण रोकने में कारगर जैव-चिकित्सकीय कचरा निस्तारण

शीर्ष अदालत ने कहा कि वह इस तथ्य की अनदेखी नहीं कर सकती कि जैव-चिकित्सकीय कचरा निस्तारण केंद्र का संचालन जनहित और पर्यावरण प्रदूषण की रोकथाम के हित में है। शीर्ष अदालत ने कहा कि इस मामले में उल्लंघनकर्ता उद्योग पर भारी जुर्माना लगाया जा सकता है और उससे पर्यावरण को क्षति की कीमत वसूली जा सकती है। पीठ ने कहा, 'हमारा मानना है कि एनजीटी ने यह सही कहा कि जब अपीलकर्ता के जैव चिकित्सकीय कचरा निस्तारण केंद्र को जरूरी स्वीकृति के बाद संचालित किया जा रहा था तो उसे पूर्व पर्यावरण मंजूरी नहीं होने के आधार पर बंद नहीं किया जा सकता।'                  

Edited By: Amit Singh