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अदालतों में जमा रकम के लिए देश में बने समान व्यवस्था, SC ने विधि आयोग से कहा- तैयार करें व्यापक कानूनी ढांचा

Published: Mon, 21 Sep 2026 02:00 AM (IST)

सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि अदालत में रकम जमा करना भुगतान नहीं माना जा सकता, जब तक वह संबंधित पक्ष को बिना शर्त उपलब्ध न हो।

अदालतों में जमा रकम के लिए देश भर में बने समान व्यवस्था- सुप्रीम कोर्ट

अदालतों में जमा रकम के लिए देश भर में बने समान व्यवस्था- सुप्रीम कोर्ट

HighLights

  1. अदालत में रकम जमा करना भुगतान नहीं, जब तक बिना शर्त उपलब्ध न हो

  2. सुप्रीम कोर्ट ने विधि आयोग को समान कानूनी व्यवस्था बनाने का निर्देश दिया

  3. अदालतों में जमा पैसे के प्रबंधन हेतु व्यापक कानूनी ढांचा आवश्यक

जागरण ब्यूरो, नई दिल्ली । अदालत में किसी डिक्री या मध्यस्थता अवार्ड की रकम जमा कर देना अपने आप में भुगतान नहीं माना जा सकता। रकम तभी भुगतान या डिक्री की संतुष्टि मानी जाएगी, जब वह संबंधित पक्ष को बिना शर्त उपलब्ध हो और वह उसे निकाल सके।

इसी कानूनी व्यवस्था को स्पष्ट करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने अदालतों में जमा होने वाली रकम के लिए देशभर में समान, स्पष्ट और व्यवस्थित कानूनी व्यवस्था की जरूरत पर जोर दिया है।

कोर्ट ने विधि आयोग से कहा है कि वह अदालतों और ट्रिब्यूनल में जमा पैसे के प्रबंधन, निवेश और उसे जारी करने के तरीकों में एकरूपता की कमी की जांच करे। इस संबंध में उपयुक्त कानून बनाने की जरूरत बताते हुए कोर्ट ने विधि आयोग से कहा कि वह इस पर व्यापक कानूनी ढांचा तैयार करने पर विचार करे।

ये बात न्यायमूर्ति पीएस नरसिम्हा और अलोक अराधे की पीठ ने नेशनल सीड्स कारपोरेशन लिमिटेड और नेशनल एग्रो सीड कारपोरेशन (इंडिया) के मामले में दिए फैसले में कही। कोर्ट दिल्ली हाई कोर्ट के उस फैसले के खिलाफ अपील पर सुनवाई कर रहा था, जिसमें मध्यस्थता अवार्ड की रकम जमा करने पर अवार्ड देनदार (जिस पर भुगतान की जिम्मेदारी थी) की ब्याज देने की जिम्मेदारी को बरकरार रखा गया था।

यह ब्याज आर्बिटल अवार्ड पास होने की तारीख से लेकर जमा रकम को अवार्ड धारक को ट्रांसफर किए जाने तक देना था। सुप्रीम कोर्ट ने हाई कोर्ट के फैसले में दखल से इन्कार करते हुए अपील निपटा दी।

इस मामले में सुप्रीम कोर्ट ने अदालतों और ट्रिब्यूनल के बीच कई अहम अंतर देखे। ये अंतर अवार्ड या डिक्री की कितनी रकम जमा करनी है, पैसा किस बैंक या फाइनेंशियल इंस्टीट्यूशन में रखा जाएगा, निवेश का तरीका क्या होगा, कितना ब्याज मिलेगा और जमा रकम को निकालने, रिन्यू करने और फिर से निवेश करने से जुड़े थे।

कोर्ट ने देखा कि अलग-अलग हाई कोर्ट में जमा रकम को संभालने के लिए अलग-अलग तरीके अपनाए गए। इस संबंध में फैसले में विभिन्न हाई कोर्ट में अपनाई जाने वाली व्यवस्था का उल्लेख किया है।

फैसले में कोर्ट ने कहा कि मध्यस्थता एवं सुलह अधिनियम, 1996 में अदालत में जमा की जाने वाली रकम और उस पर ब्याज से जुड़े सभी पहलुओं के लिए पर्याप्त स्पष्टता नहीं है। अलग-अलग अदालतों और ट्रिब्यूनलों में जमा रकम को लेकर अलग-अलग तरीके अपनाए जाने से असमानता पैदा हो सकती है।

अपील या अन्य न्यायिक कार्यवाही के दौरान अदालतें अलग-अलग मामलों में रकम जमा करने की मात्रा, उसे किस बैंक या संस्था में रखा जाए, उसके निवेश का तरीका, प्रबंधन, निकासी और उस पर मिलने वाले ब्याज को लेकर अलग निर्देश दे सकती हैं।

ऐसे में इस पूरी प्रक्रिया के लिए व्यापक कानूनी ढांचा जरूरी है। कोर्ट ने सुझाव दिया कि एक कामन प्लेटफार्म के जरिए स्टैंडर्डाइजेशन हासिल किया जा सकता है। इसके तहत अलग-अलग कोर्ट और ट्रिब्यूनल में जमा की गई रकम को एक साथ इकट्ठा करके किसी सही फाइनेंशियल इंस्ट्रूमेंट में निवेश किया जाए।

कोर्ट ने माना कि सिर्फ रकम जमा करना पर्याप्त नहीं है। पीठ ने स्पष्ट किया कि जमा रकम और भुगतान समानार्थी नहीं हैं। यदि अदालत में जमा रकम को डिक्री या अवार्ड धारक बिना किसी शर्त के निकाल सकता है, तभी उसे भुगतान की संतुष्टि माना जा सकता है और उस हिस्से पर ब्याज की देनदारी समाप्त हो सकती है।

इसके विपरीत, यदि रकम निकालने के लिए सुरक्षा देने जैसी शर्त लगा दी गई है, तो केवल रकम जमा कर देने से ब्याज रुक नहीं जाएगा। इस मामले में शीर्ष कोर्ट ने पाया कि रकम जमा होने के बावजूद उसका एक हिस्सा अवार्ड धारक के लिए स्वतंत्र रूप से उपलब्ध नहीं था। इसलिए संबंधित अवधि का ब्याज जारी रहा।

सुप्रीम कोर्ट ने इस महत्वपूर्ण मुद्दे को विधि आयोग को विचार के लिए भेजते हुए उसे संबंधित कानूनी प्रविधानों की समीक्षा करने को कहा है। आयोग को विदेशी व्यवस्थाओं का अध्ययन करने और भारतीय रिजर्व बैंक, वित्त मंत्रालय तथा कानून एवं न्याय मंत्रालय से परामर्श करने का निर्देश दिया गया है।

कोर्ट ने अमेरिका और कनाडा में अदालतों में जमा रकम के प्रबंधन से जुड़ी व्यवस्थाओं का भी उल्लेख किया है। रजिस्ट्री को फैसले की प्रति विधि आयोग के अध्यक्ष, आरबीआइ गवर्नर तथा वित्त और कानून एवं न्याय मंत्रालयों के संबंधित सचिवों को भेजने का निर्देश दिया है।