सेशन कोर्ट नहीं दे सकता 'जीवन भर जेल' की सजा, सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला
सुप्रीम कोर्ट ने फैसला सुनाया है कि हत्या के मामलों में ट्रायल कोर्ट दोषी को 'जीवन भर जेल' की सजा नहीं दे सकते।
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ट्रायल कोर्ट 'जीवन भर जेल' की सजा नहीं दे सकते: SC

समय कम है?
जानिए मुख्य बातें और खबर का सार एक नजर में
डिजिटल डेस्क, नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट ने एक अहम फैसले में गुरुवार को कहा कि हत्या के मामले में किसी आरोपित को दोषी ठहराते समय ट्रायल कोर्ट यह आदेश नहीं दे सकता कि दोषी अपनी बची हुई पूरी जिंदगी जेल में ही बिताएगा।
जस्टिस अरविंद कुमार और जस्टिस विपुल एम. पंचोली की पीठ ने कहा कि हालांकि आजीवन कारावास का मतलब दोषी के पूरे जीवनकाल की कैद होता है, लेकिन छूट और सजा कम कराने की वैधानिक शक्तियों को ट्रायल कोर्ट द्वारा सीमित नहीं किया जा सकता।
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि ट्रायल कोर्ट का यह निर्देश कि आजीवन कारावास प्राकृतिक जीवन के अंत तक जारी रहेगा, मौजूदा वैधानिक व्यवस्था के खिलाफ है।
बिना वैधानिक छूट के आजीवन कारावास जैसी विशेष श्रेणी की सजा देने का अधिकार केवल हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट जैसी संवैधानिक अदालतों के पास है, ट्रायल कोर्ट के पास नहीं।
यह फैसला लुधियाना (पंजाब) में दिसंबर 2009 में एक महिला और उसकी दो नाबालिग बेटियों की हत्या से जुड़े मामले में आया।
साल 2014 में ट्रायल कोर्ट ने दोषियों को उम्रकैद के साथ-साथ "शेष जीवन जेल में बिताने" का निर्देश दिया था, जिसे पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट ने 2022 में बरकरार रखा था।
सुप्रीम कोर्ट ने दोषियों की हत्या (आइपीसी की धारा 302) के तहत दोषसिद्धि को तो बरकरार रखा, लेकिन ट्रायल कोर्ट के उस निर्देश को खारिज कर दिया जिसमें आजीवन कारावास को प्राकृतिक जीवन तक सीमित किया गया था।
कोर्ट ने इसके स्थान पर दोनों दोषियों को 25 साल के कठोर कारावास की सजा सुनाई, जिसमें वैधानिक छूट का लाभ नहीं मिलेगा। सुप्रीम कोर्ट के इस निर्णय से आपराधिक न्याय प्रणाली में ट्रायल कोर्ट के अधिकार क्षेत्र की सीमाएं और स्पष्ट हो गई हैं।
(न्यूज एजेंसी पीटीआई के इनपुट के साथ)
