विज्ञापन हटाएंसिर्फ खबर पढ़ें

शिवसेना UBT के 6 सांसदों के विलय को स्पीकर की मंजूरी पर सुप्रीम कोर्ट में 8 दिसंबर को अंतिम सुनवाई

Published: Tue, 27 Oct 2026 11:43 PM (IST)

सुप्रीम कोर्ट 8 दिसंबर को शिवसेना (यूबीटी) के छह सांसदों के एकनाथ शिंदे गुट में विलय को लोकसभा अध्यक्ष की ...और पढ़ें

शिंदे गुट में छह सांसदों के विलय पर सुप्रीम कोर्ट में 8 दिसंबर को अंतिम सुनवाई

शिंदे गुट में छह सांसदों के विलय पर सुप्रीम कोर्ट में 8 दिसंबर को अंतिम सुनवाई

HighLights

  1. सुप्रीम कोर्ट 8 दिसंबर को करेगा अंतिम सुनवाई।

  2. लोकसभा अध्यक्ष ने दी थी विलय को मंजूरी।

  3. दल-बदल कानून पर उठे हैं अहम सवाल।

डिजिटल डेस्क, नई दिल्ली। शिवसेना (यूबीटी) के छह सांसदों के एकनाथ शिंदे के नेतृत्व वाली शिवसेना में विलय को लोकसभा अध्यक्ष की मंजूरी देने के मामले में सुप्रीम कोर्ट आठ दिसंबर को अंतिम सुनवाई करेगा। मंगलवार को न्यायमूर्ति पीएस नरसिम्हा और न्यायमूर्ति आलोक आराधे की पीठ ने याचिका को अंतिम निपटारे के लिए सूचीबद्ध किया।

शिवसेना (यूबीटी) के सांसद अरविंद सावंत की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल ने सुनवाई में देरी पर सवाल उठाया। उन्होंने कहा कि अदालत ने जुलाई में नोटिस जारी किया था, लेकिन लोकसभा अध्यक्ष का कार्यालय अब तक पेश नहीं हुआ। पीठ ने दर्ज किया कि नोटिस की तामील हो चुकी है और मामले को अंतिम सुनवाई के लिए सूचीबद्ध कर दिया।

शीर्ष अदालत ने 22 जुलाई को लोकसभा अध्यक्ष के कार्यालय और अन्य संबंधित पक्षों से जवाब मांगा था। हालांकि, उसने विलय की मंजूरी पर अंतरिम रोक लगाने से इन्कार कर दिया था।

मानसून सत्र से पहले 18 जुलाई को लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला ने शिवसेना (यूबीटी) के छह सांसदों के शिंदे गुट में विलय को मंजूरी दी थी। इसके बाद शिंदे गुट के लोकसभा सांसदों की संख्या सात से बढ़कर 13 हो गई। शिवसेना (यूबीटी) के टिकट पर कुल नौ सांसद चुने गए थे।

याचिकाकर्ता का कहना है कि इस मामले में संवैधानिक नैतिकता और संसदीय लोकतंत्र से जुड़े अहम सवाल हैं। अब सुप्रीम कोर्ट यह तय करेगा कि छह सांसदों के विलय को मान्यता देने का फैसला कानूनी रूप से उचित था या नहीं।

दल-बदल कानून
संविधान की दसवीं अनुसूची के तहत विलय के आधार पर अयोग्यता से छूट के लिए मूल राजनीतिक दल का दूसरे दल में विलय और संबंधित विधायी दल के कम से कम दो-तिहाई सदस्यों की सहमति जरूरी है। दो-तिहाई सांसदों की सहमति अपने आप में पर्याप्त है या मूल राजनीतिक दल का विलय भी अनिवार्य है, यही इस मामले का प्रमुख कानूनी सवाल है। (समाचार एजेंसी पीटीआई के इनपुट के साथ)