नई दिल्ली, प्रेट्र: सुप्रीम कोर्ट ने राजस्थान हाई कोर्ट के उस आदेश को रद कर दिया है, जिसमें 'सहायक' के तौर पर काम करने वाले एक व्यक्ति को बीमा कवर देने से इनकार किया गया था। शीर्ष अदालत ने उस आदेश को पूरी तरह से अनुचित बताया है। जस्टिस हेमंत गुप्ता और जस्टिस वी रामसुब्रमण्यम की पीठ ने कहा कि सहायक और क्लीनर के कर्तव्यों का कोई स्पष्ट सीमांकन नहीं है। हमने पक्षों के वकील को सुना और पाया कि हाई कोर्ट ने इस तर्क पर अपील स्वीकार कर ली कि नियोक्ता द्वारा नियुक्त क्लीनर और सहायक दो अलग-अलग कर्तव्यों में लगे हुए हैं और इनमें एक सहायक बीमा पालिसी द्वारा कवर नहीं किया जाता है।

शीर्ष अदालत ने कहा कि हाई कोर्ट ने यह निष्कर्ष दर्ज किया कि मृतक सहायक माना जाता था। एक सहायक या क्लीनर के कर्तव्यों के किसी स्पष्ट सीमांकन के अभाव में और इस तथ्य को देखते हुए कि सहायक और क्लीनर का परस्पर उपयोग किया जाता है, ऐसे में मृतक को एक सहायक मानकर दावा अस्वीकार करना पूरी तरह से अनुचित है।शीर्ष अदालत राजस्थान हाई कोर्ट के एक आदेश के खिलाफ दायर एक अपील पर सुनवाई कर रही थी जिसमें कर्मचारी मुआवजा अधिनियम, 1923 की धारा 30 के तहत बीमा कंपनी की अपील को अनुमति दी गई थी।

इस मामले में मृतक तेज सिंह को नियोक्ता द्वारा एक सहायक के रूप में लगाया गया था, जिसकी बोरवेल वाहन पर कुएं के आसपास की मिट्टी धंसने से मृत्यु हो गई थी। इस मामले में मुआवजे के लिए अधिनियम के तहत कार्मिक आयुक्त के समक्ष याचिका दायर की गई थी। आयुक्त ने अंतिम संस्कार के खर्च के रूप में 2,500 रुपये के साथ 3,27,555 रुपये की राशि का भुगतान देने का आदेश पारित किया।

आदेश में मृतक के कानूनी वारिसों को दुर्घटना की तिथि से 18 प्रतिशत प्रति वर्ष की दर से ब्याज देने की बात भी शामिल थी। इस पर बीमा कंपनी ने हाईकोर्ट में अपील दायर कर दी।हाई कोर्ट ने यह कहते हुए अपील स्वीकार कर ली कि मृतक एक सहायक था, हालांकि पालिसी में क्लीनर या वाहन के चालक को शामिल किया गया था। हाई कोर्ट ने इस मामले में किए गए भुगतान पर ब्याज दर घटाकर 12 प्रतिशत सालाना कर दी और बीमा कंपनी को वारिसों को किए गए भुगतान से वसूली करने की छूट दे दी।

Edited By: Amit Singh