नई दिल्ली, प्रेट्र। सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को दिल्ली हाई कोर्ट के उस आदेश पर रोक लगा दी, जिसमें सभी विचाराधीन कैदियों को 2-13 नवंबर के बीच चरणबद्ध तरीके से आत्मसमर्पण करने का निर्देश दिया गया था। इन विचाराधीन कैदियों की जमानत अवधि लॉकडाउन के कारण बढ़ा दी गई थी। जस्टिस एल नागेश्वर राव, हेमंत गुप्ता और अजय रस्तोगी की पीठ ने हाई कोर्ट के आदेश को चुनौती देने वाली याचिका पर दिल्ली सरकार और अन्य को नोटिस जारी किया और जवाब मांगा।

शीर्ष अदालत दिल्ली उच्च न्यायालय के आदेश के खिलाफ राष्ट्रीय जेल सुधार मंच (NFPR) द्वारा दायर एक अपील पर सुनवाई कर रही थी। उच्च न्यायालय ने आदेश दिया था कि लॉकडाउन से पहले और इस दौरान जमानत देने का उसका आदेश 31 अक्टूबर के बाद प्रभावी नहीं रहेगा। मामले में याचिकाकर्ता की ओर से वरिष्ठ वकील कॉलिन गोंजाल्विस और अजय वर्मा उपस्थित हुए।

शीर्ष अदालत के समक्ष अपनी याचिका में एनएफपीआर ने कहा कि उच्च न्यायालय का निर्देश पूरी तरह से 23 मार्च, 2020 के आदेश की भावना के खिलाफ है। इसमें हाई कोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट द्वारा गठित उच्चाधिकार प्राप्त समिति की आठ सिफारिशों को नजरअंदाज कर दिया था।

पर्सनल इंसॉल्वेंसी मामले में सुनवाई पर विचार करेगा सुप्रीम कोर्ट

वहीं, दूसरी ओर सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार को कहा था कि देशभर के उच्च न्यायालयों में पर्सनल इंसॉल्वेंसी के मामलों में आइबीसी की धाराओं को चुनौती देने वाली याचिकाएं सुनने के बारे में वह आदेश पारित करेगा। पर्सनल इंसॉल्वेंसी मामलों में इंसॉल्वेंसी एंड बैंक्रप्सी कोड (IBC) की धाराओं को चुनौती देने वाली कई याचिकाएं देशभर के विभिन्न हाई कोर्ट में लंबित पड़ी हैं। इन सभी याचिकाओं को सुप्रीम कोर्ट में स्थानांतरित करने के लिए इंसॉल्वेंसी एंड बैंक्रप्सी बोर्ड ऑफ इंडिया (IBBI) ने शीर्ष कोर्ट में याचिका दायर की हुई है।

सुप्रीम कोर्ट ने महाराष्ट्र सरकार के उस दावे को गलत बताया है कि मराठा समुदाय को आरक्षण देने संबंधी कानून के अमल पर रोक लगाते समय उसे पूरी तरह से नहीं सुना गया। 

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