नई दिल्ली [माला दीक्षित]। सुप्रीम कोर्ट ने खेल को शिक्षा के मौलिक अधिकार का हिस्सा बनाए जाने की मांग पर केन्द्र और सभी राज्यों को नोटिस जारी कर जवाब मांगा है। कोर्ट ने ये नोटिस कानून के छात्र कनिष्क पाण्डेय की याचिका पर जारी किया है। पाण्डेय ने याचिका में खेलों को स्कूल पाठ्यक्रम का अनिवार्य हिस्सा बनाए जाने की मांग की है।

सोमवार को न्यायमूर्ति एसए बोबडे व न्यायमूर्ति एल नागेश्वर राव की पीठ ने याचिकाकर्ता के वकील सिद्धार्थ दवे व राजीव दुबे की दलीलें सुनने के बाद केन्द्र व राज्यों को नोटिस जारी कर चार सप्ताह में जवाब देने को कहा है। इससे पहले याचिका पर बहस करते हुए वकीलों ने कहा कि अनुच्छेद 21ए मुफ्त और अनिवार्य शिक्षा की बात करता है। इसमें एजूकेशन की बात भी की गई है लेकिन फिजिकल एजूकेशन में खेल को हिस्सा नहीं बनाया गया है। इस पर पीठ ने सवाल किया कि फिजिकल एजूकेशन में खेल कैसे शामिल माना जाएगा।

वकील ने कहा कि खेल के बगैर फिजिकल एजूकेशन का कोई मतलब ही नहीं है। फिजिकल एजूकेशन में खेल शामिल हैं। उन्होंने कहा कि खेलों का हाल देखा जाए तो नर्सरी से लेकर उच्च शिक्षा तक पूरे देश का खेल बजट आवंटन सिर्फ .091 फीसद है। खेलों को जरूरी बनाए जाने के बारे में यूनेस्को के आर्टिकल को लागू किया जाना चाहिए।

याचिकाकर्ता ने मांग की कि केन्द्र सरकार को निर्देश दिया जाए कि वह एक उच्च स्तरीय समिति बनाए जिसमें सांसद, खिलाड़ी और शिक्षाविद शामिल हों जो कि संविधान संशोधन कर खेल को शिक्षा के मौलिक अधिकार अनुच्छेद 21ए और राज्य के नीति निदेशक तत्वों में शामिल करने के बारे में सुझाव दे। इसके अलावा खेल गतिविधियों को बढ़ावा देने के लिए प्राथमिक, सैकेन्ड्री और उच्च स्तर पर ढांचागत संसाधन जुटाने हेतु एक कोष विकसित किया जाए।

 

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