भ्रष्टाचार और साइबर ठगी भी हत्या जितने ही बड़े अपराध, उसकी सजा और कठोर करने पर क्यों नहीं होती बात: प्रमोद कुमार दुबे
वरिष्ठ अधिवक्ता प्रमोद कुमार दुबे ने सुप्रीम कोर्ट के जज की टिप्पणी पर कहा कि मृत्युदंड कम करने का उदार ...और पढ़ें

सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ एडवोकेट प्रमोद कुमार दुबे।

समय कम है?
जानिए मुख्य बातें और खबर का सार एक नजर में
रुमनी घोष। 'वर्ल्ड पॉपुलेशन रिव्यू 2026' जैसी वैश्विक रिपोर्टों के अनुसार दुनिया भर में भारत की स्थिति बीच की है। सबसे ज्यादा अपराध वाले देशों की सूची में 77वें स्थान पर और प्रति व्यक्ति अपराध दर के मामले में अमेरिका और यूनाइटेड किंगडम के पीछे है।
सुप्रीम कोर्ट भी देश में बढ़ते अपराधों को लेकर चिंतित है। हाल ही में सुप्रीम कोर्ट के जज दीपांकर दत्ता ने एक मामले की सुनवाई के दौरान टिप्पणी की कि मौत की सजा को कम करने का 'उदार रवैया" अपराधों में बढ़ोतरी का कारण बन रहा है। उनके इस बयान को लेकर कानूनविदों की अलग-अलग राय सामने आ रही है। एक वर्ग का मानना है कि गंभीर अपराधों के दोषियों को मौत की सजा देने से अपराधी मानसिकता वाले लोगों के भीतर भय उत्पन्न होगा और अपराधों में कमी आएगी।
वहीं, दूसरी ओर एक वर्ग की राय है कि सजा से अपराध को रोका नहीं जा सकता है। अपराध घटित होने से लेकर अपराधी बनने तक की प्रक्रिया के लिए बहुत से कारक जिम्मेदार होते हैं।
सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ एडवोकेट प्रमोद कुमार दुबे भारतीय दंडशास्त्र (पीनोलॉजी) पर विश्वास जताते हुए बच्चन विरुद्ध सरकार केस का हवाला देते हुए कहते हैं कि बच्चन विरुद्ध पंजाब सरकार केस में सुप्रीम कोर्ट की नजीर है कि जजों को खून का प्यासा नहीं होना चाहिए। मेरे 25 वर्षों का अनुभव कहता है कि इस देश में भ्रष्टाचार और साइबर ठगी हत्या जितने ही बड़े अपराध हैं, क्योंकि इनका असर पीढ़ियों बाद भी नजर आता है। वह सवाल करते हैं कि इन व्हाइट कालर क्राइम से जुड़े मामलों में फांसी जैसी कठोर सजा दिए जाने की मांग क्यों नहीं उठती है?

संवैधानिक कानून, दीवानी, वाणिज्यिक और व्हाइट-कालर क्राइम के मामलों में लंबा अनुभव रखने वाले एडवोकेट दुबे ने 25 वर्षों के दौरान भारत की विभिन्न अदालतों में कई मामलों में पैरवी की है। इनमें राष्ट्रमंडल खेल घोटाला, कोयला घोटाला, आगस्ता वेस्टलैंड हेलीकॉप्टर मामला, कारगिल ताबूत मामला, संसद में नोट के बदले वोट मामला, सरकारी गोपनीयता अधिनियम, विदेशी बैंकों में काले धन के मामले, भ्रष्टाचार मामले में चंद्रबाबू नायडू केस, डीएलएफ, डालमिया, भूषण स्टील, भूषण पावर, सीबीआई और मनीलाड्रिंग के प्रमुख मामले, आयकर मामले में सहारा के सुब्रत राय मामला अहम हैं।
दैनिक जागरण की समाचार संपादक रुमनी घोष ने दुबे से अपराध को बढ़ावा देने वाली देश की बड़ी सामाजिक-आर्थिक और संस्थागत चुनौतियों पर विस्तार से चर्चा की। प्रस्तुत हैं बातचीत के प्रमुख अंश:
सुप्रीम कोर्ट के जज ने हाल ही में चिंता जताई है कि मौत की सजा को कम करने का उदार रवैया अपराधों में बढ़ोतरी का कारण बन रहा है। इस व्याख्या पर क्या दलील देंगे?
जहां तक मुझे जानकारी है, यह टिप्पणी सुनवाई के दौरान कही गई थी। आदेश में कहीं इसका उल्लेख नहीं है, इसलिए इस पर कोई प्रतिक्रिया नहीं देना चाहता हूं।
यह तो मानते हैं न कि देश में अपराध में लगातार बढ़ोतरी हो रही है?
निश्चित रूप से। समाज में बदलाव आ रहे हैं तो अपराध की प्रकृति, प्रवृत्ति और आवृत्ति तीनों में ही बदलाव आएंगे।
वर्ल्ड पापुलेशन रिव्यू-2026 जैसी वैश्विक रिपोर्टों के अनुसार दुनिया भर में भारत 77वें स्थान पर है। प्रति व्यक्ति अपराध दर के मामले में बेशक भारत, अमेरिका व यूनाइटेड किंगडम के पीछे है, लेकिन गंभीर अपराध बढ़ रहे हैं? क्यों?
अपराधों की श्रेणी में हम वैश्विक स्तर पर 77वें स्थान पर हैं, यानी हमसे ऊपर कई देश हैं। बावजूद इसके मैं मानता हूं कि अपराधों की संख्या में लगातार बढ़ोतरी चिंता का विषय है। यदि एक अपराध भी हो रहा है तो इसका मतलब उस समाज में अपराध का बीज मौजूद है और उस अपराध को अंजाम देने वाला आपराधिक प्रवृत्ति का व्यक्ति भी मौजूद है। जरूरत इस बात की है कि हम यह तलाशें कि एक अपराध होना भी हमेशा चिंता की बात होनी चाहिए।

आपके अनुसार अपराध बढ़ने की क्या वजह है?
देश की बढ़ती आबादी। हालांकि इतनी आबादी के बावजूद हम 77वें स्थान पर हैं।
आबादी का अपराध से क्या संबंध है?
किसी जमाने में 10 हजार लोगों पर एक थाना स्थापित किया गया था, आज उस थाना क्षेत्र के अधीन 10 लाख की आबादी आ गई है। पुलिसवालों की संख्या भी उस अनुपात में नहीं बढ़ी है। ऐसे में कैसे उम्मीद की जा सकती है, कि कानून-व्यवस्था चुस्त होगी। कानून-व्यवस्था चुस्त नहीं होगी, तो अपराध बढ़ेंगे ही। सिर्फ अपराध ही नहीं, शिक्षा, स्वास्थ्य, नौकरी, खाद्य और संसाधन सभी मामलों में गिरावट के लिए आबादी जिम्मेदार है। इन सभी क्षेत्रों में अराजकता-अव्यवस्था के बीच ही अपराध पनपते हैं।
आप जिस तरह के 'ब्लू कालर क्राइम' के बढ़ने की बात कह रही हैं, वह इसी वजह से हो रहा है। बेरोजगारी ही अपराध करने, नशे की लत में फंसने और अपराध की दुनिया से जोड़ रही है। ऐसे में जब अपराध घटित हो जाता है, तो हम उस अपराधी को फांसी पर चढ़ाने की मांग करते हैं। इससे पहले व्यवस्था सुधारने और उस व्यक्ति को अपराधी बनने से रोकने की बात क्यों नहीं करते? 'वेलफेयर स्टेट' होने के नाते तो हमें इस पर विचार करना चाहिए कि अपराध क्यों हो रहे हैं।
तो आपका कहना है कि व्यवस्था में खामियों की वजह से व्यक्ति अपराधी बनता है। उसका कोई दोष नहीं होता है और वह सजा का हकदार नहीं है?
नहीं, अपराध करने वाला हर व्यक्ति सजा का भागीदार है, लेकिन वह सजा भारतीय दंडशास्त्र (पेनोलाजी) के अनुसार होनी चाहिए और वही होता है। यहां कोई भी सजा पीड़ित या पीड़ित पक्ष के लोगों की मांग, भीड़ का समर्थन या फिर वकील की अपील पर नहीं होती है। अदालतें सजा तय करने या सुनाने से पहले मुख्य रूप से अपराध की गंभीरता, अभियुक्त की पृष्ठभूमि और परिस्थितियों का विश्लेषण करती हैं।
भारतीय न्याय प्रणाली और सुप्रीम कोर्ट के दिशा-निर्देशों के अनुसार सजा तय करते समय इन मुख्य पहलुओं (परिस्थितियों) पर विचार किया जाता है।
पहला: अपराध की प्रकृति और गंभीरता, यानी 'एग्रेवेटिंग सरकमस्टांसेस"। इसमें यह देखा जाता है कि अपराध कैसे किया गया, उसमें कितनी क्रूरता थी, पीड़ित पर उसका क्या असर पड़ा है? इसके अलावा क्या यह ' दुर्लभ से दुर्लभ' (रेयरेस्ट आफ रेयर) मामलों की श्रेणी में आता है।
दूसरा: अभियुक्त से जुड़ी परिस्थितियां और नरमी के आधार, यानी 'मिटिगेटिंग सरकमस्टांसेस'। इसमें अभियुक्त की उम्र, उसकी सामाजिक व आर्थिक पृष्ठभूमि, उसका पिछला आपराधिक इतिहास (या पहले कोई अपराध न किया हो) और सुधार की संभावनाओं को देखा जाता है।
तीसरा: सजा से पहले की सुनवाई, यानी' प्री सेंटेंस हियरिंग'। सजा तय करने से ठीक पहले अदालत अभियुक्त को व्यक्तिगत रूप से अपनी बात रखने, उसकी पारिवारिक स्थिति या स्वास्थ्य संबंधी दलीलें पेश करने का अवसर देती है।
एक निर्दोष को सजा न मिले, यह जरूरी है, लेकिन इस सिद्धांत की आड़ में अपराधी छूट जाएं, तो क्या न्याय व्यवस्था पर जनता का भरोसा नहीं टूटता? इस असंतुलन को आप कैसे देखते हैं?
इसमें असंतुलन नहीं है, बल्कि संतुलन है...। बच्चन विरुद्ध पंजाब सरकार का एक बहुत चर्चित फैसला है, जिसमें सुप्रीम कोर्ट के आदेश में लिखा है कि जजों को खून का प्यासा नहीं होना चाहिए। इसमें रेयरेस्ट आफ रेयर केस की व्याख्या करते हुए फांसी की सजा को आजीवन कारावास में बदल दिया गया।
फांसी की सजा दे देना ही पर्याप्त नहीं है, यह देखना भी जरूरी है कि उसमें से कितने मामलों में यह सजा बरकरार रहती है। उप्र के एक जज इन दिनों फांसी की सजा दिए जाने को लेकर चर्चा में हैं, लेकिन क्या सभी मामलों में सजा बरकरार रहेगी।
क्या समय के साथ दंडशास्त्र को अपडेट करने की जरूरत नहीं है?
सुप्रीम कोर्ट के हर फैसले के साथ यह अपडेट होता रहता है। मच्छी सिंह विरुद्ध पंजाब सरकार जैसे केस के जरिये सुप्रीम कोर्ट ने सजा सुनाने से पहले दोनों पक्षों को सुनने की व्यवस्था दी है, ताकि सजा सुनाने से पहले आरोपित से जुड़े हर पहलू पर ठीक से विचार कर लिया जाए। इन केसेस में दी गई गाइडलाइन बहुत अहम है।
फांसी की सजा सुनाने में अदालतें सख्त, लेकिन उसे अंजाम देने में व्यवस्था इतनी सुस्त क्यों? क्या मृत्युदंड के मामलों में अपील और अंतिम फैसले की समय-सीमा तय नहीं होनी चाहिए?
यह सही है कि अन्य विभागों की तरह न्यायालयों में भी मानव बल और संसाधनों की कमी है। न्यायाधीशों की कमी से पीड़ितों को न्याय पाने में देरी होती है, लेकिन कहीं भी न्याय प्रणाली की प्रक्रिया की अवहेलना नहीं होती है।
कोच्ची में मिनी कूपर से तीन लोगों को कुचलने के बाद रईसजादे ने कहा कि पापा संभाल लेंगे? इस तरह की घटनाओं में यदि कड़ी सजा न दी जाए, तो क्या समाज में गलत संदेश नहीं जाएगा?
इस तरह के मामलों में बिलकुल कड़ी सजा मिलनी चाहिए, लेकिन सजा हमारी-आपकी मांग पर निर्धारित नहीं होती है। सजा देते वक्त जज दंड शास्त्र में दिए गए पैमाने पर खरे उतरकर ही फैसला सुना पाएंगे।
क्या पीनोलॉजी या दंडशास्त्र को समय-समय पर अपडेट करने की जरूरत नहीं है?
सुप्रीम कोर्ट के हर फैसले के साथ यह अपडेट होता रहता है। न्यायप्रणाली में तीन तरह से सजा का प्रविधान है। डेटरेंस, रेट्रीब्यूशन और रिफार्मेशन। डेटरेंस यानी निवारण या रोकथाम। इस तरह की सजा दी जाए, कि भविष्य में वह अपराध घटित न हो।
रेट्रीब्यूशन यानी प्रतिकार या विरोध। इसके तहत अपराधी ने जो अपराध किया है, उसे वैसी ही सजा दी जाए। यानी हत्या के बदले फांसी। इसका उद्देश्य समाज को संदेश देना भी है। रिफार्मेशन, इसमें परिस्थितियां देखकर सजा तय की जाती है।
साधारण भाषा में कहूं तो यदि अपराध डेटरेंस और रेट्रीब्यूशन की श्रेणी में है। यानी अपराधी द्वारा सुनियोजित ढंग से ऐसा अपराध किया गया है, जिसके दोबारा घटित होने से समाज को खतरा है। उसे रोकने की जरूरत है और समाज को संदेश भी देना है। इसके साथ ही अपराधी में सुधार की कोई गुंजाइश नहीं है।
इस तरह के मामलों में फांसी की सजा दी जाती है। जैसे याकूब मेनन, निर्भया कांड के अपराधी और कसाब की फांसी है। भारत में आखिरी फांसी की सजा के तौर पर यही तीन मामले हैं, जो अंजाम तक पहुंचे।
कोच्ची में मिनी कूपर से तीन लोगों को कुचलने के बाद रईसजादे ने कहा कि पापा संभाल लेंगे? इस तरह की घटनाओं में यदि कड़ी सजा न दी जाए, तो क्या समाज में गलत संदेश नहीं जाएगा?
इस तरह के मामलों में बिलकुल कड़ी सजा मिलनी चाहिए, लेकिन सजा हमारी-आपकी मांग पर निर्धारित नहीं होती है। सजा देते वक्त जज दंड शास्त्र में दिए गए पैमाने पर खरे उतरकर ही फैसला सुना पाएंगे।
क्या पीनोलॉजी या दंडशास्त्र को समय-समय पर अपडेट करने की जरूरत नहीं है?
सुप्रीम कोर्ट के हर फैसले के साथ यह अपडेट होता रहता है। न्यायप्रणाली में तीन तरह से सजा का प्रविधान है। डेटरेंस, रेट्रीब्यूशन और रिफार्मेशन। डेटरेंस यानी निवारण या रोकथाम। इस तरह की सजा दी जाए, कि भविष्य में वह अपराध घटित न हो। रेट्रीब्यूशन यानी प्रतिकार या विरोध। इसके तहत अपराधी ने जो अपराध किया है, उसे वैसी ही सजा दी जाए। यानी हत्या के बदले फांसी। इसका उद्देश्य समाज को संदेश देना भी है। रिफार्मेशन, इसमें परिस्थितियां देखकर सजा तय की जाती है।
साधारण भाषा में कहूं तो यदि अपराध डेटरेंस और रेट्रीब्यूशन की श्रेणी में है। यानी अपराधी द्वारा सुनियोजित ढंग से ऐसा अपराध किया गया है, जिसके दोबारा घटित होने से समाज को खतरा है। उसे रोकने की जरूरत है और समाज को संदेश भी देना है। इसके साथ ही अपराधी में सुधार की कोई गुंजाइश नहीं है। इस तरह के मामलों में फांसी की सजा दी जाती है। जैसे याकूब मेनन, निर्भया कांड के अपराधी और कसाब की फांसी है। भारत में आखिरी फांसी की सजा के तौर पर यही तीन मामले हैं, जो अंजाम तक पहुंचे।
आप ब्लू कालर क्राइम की तुलना में व्हाइट कालर क्राइम को ज्यादा खतरनाक बताते हैं? क्यों?
ब्लू कलर क्राइम में चोरी, लूट, डकैती, दुष्कर्म, हत्या जैसी वारदातें आती हैं। इन अपराधों में अधिकांशत: निम्न या निम्न मध्यम वर्गीय परिवार ही लिप्त होते हैं। इनमें से भी अधिकांश घटनाएं क्षणिक आवेश व परिस्थितिवश होती हैं। जबकि व्हाइट कालर क्राइम में भ्रष्टाचार और सायबर ठगी शामिल है। इसमें शिक्षित-पढ़ा-लिखा वर्ग शामिल होता है और ये समाज के लिए ज्यादा खतरनाक साबित होते हैं।
सोचिए, हजारों करोड़ों रुपये का भ्रष्टाचार कर बनाए गए घटिया इंफ्रास्ट्रक्चर से आम लोगों की जान चली जाती है। सरकार की संपत्ति पर डाका डाला जाता है। साइबर ठगी के जरिये आम लोगों की जमा-पूंजी और रोजी-रोटी छीन ली जाती है...लेकिन इनके अपराधियों के लिए कभी फांसी की सजा की मांग नहीं उठती है...क्यों? इस पर विचार किया जाना चाहिए।
