नई दिल्ली [प्रेट्र]। महाराष्ट्र के कुछ पुलिसकर्मियों को हिरासती मौत मामले में मिली तीन की सजा को सात साल करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि ज्यादा अधिकार के साथ बड़ी जवाबदेही भी आती है। शीर्ष अदालत ने कहा कि ऐसी घटनाओं में पुलिस की संलिप्तता से लोगों का आपराधिक न्याय प्रणाली में भरोसा खत्म हो जाएगा।

जस्टिस एनवी रमाना और जस्टिस एमएम शांतानागौदर ने कहा कि यह महत्वपूर्ण है कि पुलिस के लिए लोकतांत्रिक पुलिसिंग के विचार को ध्यान में लेने की जरूरत है। जहां अपराध नियंत्रण ही अंतिम नहीं है, बल्कि इस व्यवस्था को हासिल करना भी उतना ही महत्वपूर्ण है।

पीठ ने कहा, 'इस बात को ध्यान में रखना परिप्रेक्ष्य से बाहर नहीं होगा कि महाराष्ट्र पुलिस का मंत्र, 'सदरक्षकन्याय खलनिग्रहन्याय' है। इसका अर्थ अच्छे की रक्षा और दुष्टों को दंड है। इसका आदर किए जाने की जरूरत है। जिन्हें आपराधिक कानून का प्रशासक कहा जाता है वह निश्चित रूप से यह ध्यान में रखें कि उनका कर्तव्य सिर्फ किसी आरोपित तक ही सीमित नहीं है, बल्कि बड़े परिप्रेक्ष्य में राज्य और समुदाय भी है।'

क्या है मामला
अभियोजन के मुताबिक, महाराष्ट्र पुलिस के अधिकारियों ने गश्ती के दौरान 23 जून 1993 को रात एक बजे चोरी के आरोप में जोइनस को पकड़ लिया था। उसे उसके घर के बाहर बिजली के पोल से बांध दिया और फिर पिटाई की।

विभिन्न स्थानों पर ले जाने के बाद 3:55 बजे भोर में उसे लॉकअप में डाला, लेकिन सुबह में वह मृत पाया गया। निचली अदालत ने पुलिसकर्मियों को तीन-तीन साल की सजा सुनाई थी। हाई कोर्ट ने सजा बरकरार रखी थी।

Posted By: Vikas Jangra