नई दिल्ली, प्रेट्र। सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि संविधान अपना महत्व खो देगा अगर मूल अधिकारों के उल्लंघन का निवारण नहीं होता है। यह अधिकार हैं-जैसे नागरिकों के जीवन का अधिकार, समानता का अधिकार और अभिव्यक्ति की आजादी आदि।

उत्तर प्रदेश में एक दुष्कर्म के मामले में पूर्व मंत्री आजम खां के विवादास्पद बयान के मुद्दे पर जस्टिस अरुण मिश्रा की अध्यक्षता में पांच जजों की संविधान पीठ ने बुधवार को कहा कि अगर सरकारी कामकाज को देखने वाले लोगों की ओर से मूल अधिकारों के उल्लंघन का निवारण नहीं किया जाएगा तो संविधान अपना महत्व ही खो देगा। पीठ ने कहा कि ऐसी सरकारी व्यवस्थाएं और लोग मानने लगे हैं कि वह ऐसे मूलभूत अधिकारों का उल्लंघन करने के लिए जवाबदेह नहीं ठहराए जा सकते। इस मामले में बतौर न्याय मित्र (एमीकस क्यूरी) सुप्रीम कोर्ट की सहायता कर रहे वरिष्ठ अधिवक्ता हरीश साल्वे ने कहा कि सरकारी कर्मचारी या जरिया रहते जनता के प्रति दायित्वों का निर्वाह करने का जज्बा दशकों पहले मर चुका है। चूंकि मूलत: सरकारी दायित्वों का निर्वाह अब निजी लोग और कंपनियां करने लगी हैं।

समाज के प्रगति करने के साथ ही शासन की भूमिका घटी

जस्टिस इंदिरा बनर्जी, विनीत सरन, एमआर शाह और एस.रवींद्र भट की पीठ ने कहा कि समाज के प्रगति करने के साथ ही शासन की भूमिका घट गई है। सरकारी अधिकारियों की अब हमारे जीवन में भूमिका कम हो गई है। इसी के हिसाब से हमारे न्यायिक क्षेत्र में बदलाव होना चाहिए। खंडपीठ ने कहा कि क्या आप यह कह रहे हैं कि अगर जनकार्यो (जैसे रेलवे और टोल टैक्स) का जिम्मा निजी कंपनियों को सौंपा जाता है तो उन्हें मूलभूत अधिकारों के निर्वाह के लिए जिम्मेदार भी बनाना होगा। साल्वे ने कहा कि नागरिकों के मूलभूत अधिकारों को सुनिश्चित करने के लिए निजी संस्थाओं के विशेषाधिकारों को संविधान के सिद्धांतों से 'गठबंधन' करने का समय आ गया है। साल्वे ने कहा कि लोकतंत्र नाजुक है और वह लोकतांत्रिक प्रणाली पर जनता के विश्वास पर निर्भर करता है।

पीड़ित के अधिकारों का ही उल्लंघन

इससे पहले, वर्ष 2016 के बुलंदशहर सामूहिक दुष्कर्मकांड पर आजम के विवादास्पद बयान पर संविधान पीठ ने संज्ञान लेते हुए इसे राजनीतिक षड्यंत्र का हिस्सा बताया था। उसके बाद आजम खां ने सुप्रीम कोर्ट के समक्ष अपने बयान पर बिना शर्त माफी मांग ली थी। तब सर्वोच्च अदालत ने खां के खिलाफ मामला निपटाते हुए इसे पांच जजों की संविधान पीठ को सौंप दिया था। इस पीठ से कहा गया था कि वह बताए कि क्या एक मंत्री एक ऐसा बयान दे सकता है जो पीड़ित के अधिकारों का ही उल्लंघन ही नहीं करता हो बल्कि उसके लिए निष्पक्ष जांच और सुनवाई को भी प्रभावित कर सकता है।

 

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