नई दिल्‍ली [जागरण स्‍पेशल]। सुप्रीम कोर्ट ने अयोध्‍या की विवादित जमीन के मालिकाना हक पर फैसला सुनाते हुए  इस जमीन को राम जन्‍मभूमि न्‍यास को सौंप दिया है। इसके साथ ही कोर्ट ने अपने आदेश में निर्मोही अखाड़ा की याचिका को खारिज कर दिया। इसका अर्थ है कि निर्मोही अखाड़े को इस जमीन का कोई मालिकाना हक नहीं है। कोर्ट ने निर्मोही अखाड़े को सेवादार का भी अधिकार नहीं दिया है। हालांकि निर्मोही अखाड़े के महंत स्वामी देवेंद्र दास जी इस फैसले का स्‍वागत किया है। उनका कहना है कि पंचों के बीच इस फैसले पर मंथन किया जाएगा। अखाड़े ने इस पर भी खुशी जताई है कि सुप्रीम कोर्ट ने माना है कि राम जन्मभूमि अयोध्या में है और इस पर कोई विवाद नहीं है। 

सुनवाई में ही खारिज कर दी थी दलील

हालांकि, मुस्लिम पक्ष ने अपनी दलीलों में माना था कि निर्मोही अखाड़ा वहां का सेवादार रहा है। आपको बता दें कि कोर्ट ने जो आदेश आज दिया है वह काफी हद तक पहले ही साफ हो गया था। मामले की निरंतर सुनवाई के दौरान ही कोर्ट ने साफ कर दिया था कि उनके द्वारा दायर मुकदमे में मालिक घोषित करने की मांग का जिक्र नहीं है।

हाईकोर्ट से उलट है फैसला 

सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला हाईकोर्ट के फैसले से बिल्‍कुल उलट है। आपको बता दें कि हाईकोर्ट ने अपने 2010 के फैसले में 2.77 एकड़ की विवादित जमीन के एक तिहाई भू-भाग का मालिकाना हक सौंपा था। हाईकोर्ट ने यहां पर मौजूद राम चबूतरा और सीता रसोई का मालिकाना हक निर्मोही अखाड़े को सौंपी थी।

मांगा था कब्‍जा और प्रबंधन का अधिकार 

निर्मोही अखाड़े ने सुप्रीम कोर्ट में जमीन का मालिकाना हक जताते हुए राम जन्‍मभूमि पर कब्‍जा और प्रबंधन का अधिकार मांगा था। इस पक्ष का कहना था कि इस पर होने वाली पूजा अर्चना और प्रबंधन  का काम हमेशा से ही निर्मोही अखाड़ा कराता रहा है। इतना ही नहीं वह यहां पर आने वाले चढ़ावे को भी हासिल करता रहा है। लिहाजा उन्‍हें ही यह हक मिलना चाहिए। 

क्‍या है निर्मोही अखाड़ा

गौरतलब है कि निर्मोही अखाड़ा रामनंदी बैरागी का एक प्राचीन मठ है जिसको रामानंद ने शुरू किया था। इस मठ के अंतर्गत अयोध्‍या में स्थित कई मंदिर आते हैं। इसके प्रमुख महंत भास्कर दास का  सितंबर 2017 को ब्रेन स्‍ट्रॉक के चलते उनका निधन हो गया था। वह इस मामले में प्रमुख पक्षकार भी थे। 19 मार्च 1949 को निर्मोही अखाड़े ने पंजीकरण कराया था। निर्मोही अखाड़ा पहली बार 1949 में उस वक्‍त चर्चा में आया था जब उन्‍होंने कोर्ट में अयोध्‍या की विवादित जमीन को लेकर मुकदमा दायर किया था।

पहली बार दायर की थी याचिका 

आपको बता दें कि निर्मोही अखाड़ा खुद को उस स्थल का संरक्षक बताता रहा है। अयोध्या मामले में सबसे पहली कानूनी प्रक्रिया 1885 में इसी अखाड़े के महंत रघुवीर दास ने शुरू की थी। इस याचिका में अखाड़े की तरफ से यहां स्थित राम चबूतरे पर छतरी बनवाने की अनुमति मांगी, लेकिन फैजाबाद की जिला अदालत ने उनकी इस याचिका को खारिज कर दिया गया था। इनकी दलील थी कि इस विवादित स्‍थल पर 1885 से मुस्लिम समाज ने कभी नमाज नहीं पढ़ी है। 22-23 दिसंबर 1949 की रात यहां पर मूर्तियां रखी गई थीं। 

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Posted By: Kamal Verma

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