नई दिल्ली, प्रेट्र। सुप्रीम कोर्ट ने एक महिला द्वारा पश्चिम बंगाल कैडर के आइपीएस अधिकारी पर बलात्कार का आरोप लगाने के मामले की जांच किसी केंद्रीय एजेंसी को स्थानांतरित करने से मंगलवार को इन्कार कर दिया। दिल्ली पुलिस ने इस मामले में दो एफआइआर दर्ज की थी।

पहली एफआइआर महिला ने दर्ज कराई थी जिसमें आरोप लगाए गए थे कि फेसबुक पर दोस्त बने आइपीएस अधिकारी ने उसके साथ दुष्कर्म किया, वहीं दूसरी एफआइआर आइपीएस अधिकारी की मां ने दर्ज कराई थी जिसमें आरोप लगाए थे कि महिला और उसके परिवार के सदस्य उन पर 15 लाख रुपये देने का दबाव बना रहे हैं और ऐसा नहीं करने पर दुष्कर्म एवं अन्य आपराधिक मामले दर्ज कराने की धमकी दे रहे हैं।

सुप्रीम कोर्ट ने कहा, आगे कुछ भी करने की जरूरत नहीं

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि 'ऐसा कुछ भी ठोस' दिखाने के लिए नहीं है कि जांच सही दिशा में नहीं हो रही है या किसी विशिष्ट दिशा में जांच नहीं हो सकी है। कोर्ट ने कहा, 'हमारा मानना है कि आगे कुछ भी करने की जरूरत नहीं है। इस चरण में यह कहा जा सकता है कि अगर कोई भी वीडियो या आडियो रिकार्डिग याची के पास है तो उसे आज से दो दिनों के अंदर एसआइटी को सौंपा जा सकता है। यह एसआइटी पर छोड़ा जाता है कि वह विचार करे कि इस हिस्से को पूरक आरोपपत्र में शामिल करना है या नहीं जिसे दायर करने पर विचार किया जा रहा है।'

कोर्ट ने कहा, 'उपरोक्त परिस्थितियों में हमें कोई कारण नहीं दिखता कि दोनों प्राथमिकियों की जांच इस चरण में किसी केंद्रीय जांच एजेंसी को सौंपी जाए।'

नोटिस जारी कर जज ने पूछे सवाल

जस्टिस यूयू ललित और जस्टिस इंदू मल्होत्रा की पीठ ने उस महिला को भी नोटिस जारी कर पूछा कि गलत बयान देने के लिए उसके खिलाफ अवमानना की कार्रवाई क्यों न शुरू की जाए और गलत बयान देने के लिए उसके खिलाफ आदेश क्यों न पारित किया जाए।

सुप्रीम कोर्ट ने रजिस्ट्री को निर्देश दिया कि मामले को स्वत: संज्ञान कार्यवाही के लिए दर्ज किया जाए और इस आदेश की प्रति महिला को भेजी जाए। साथ ही कोर्ट ने महिला को 14 जनवरी को व्यक्तिगत रूप से पेश होने का आदेश दिया।

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