'अस्पतालों में 10 गुना कीमत पर दवा बेचना कत्लेआम', जीवन रक्षक दवाओं की कीमतों पर सुप्रीम कोर्ट की सख्त टिप्पणी
सुप्रीम कोर्ट ने कैंसर सहित जीवनरक्षक दवाओं के खुदरा और अधिकतम खुदरा मूल्य में भारी अंतर पर चिंता जताई, इसे 'कत्लेआम' बताया।

अस्पतालों द्वारा अपनी फार्मेसी से दवा खरीदने पर कोर्ट की चिंता।
HighLights
कैंसर दवाओं की 10 गुना कीमत वृद्धि को 'कत्लेआम' बताया।
अस्पतालों द्वारा अपनी फार्मेसी से दवा खरीदने पर कोर्ट की चिंता।
दवाओं के खुदरा और अधिकतम मूल्य अंतर पर समान नियम की मांग।
जागरण ब्यूरो, नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट ने कैंसर सहित अन्य जीवनरक्षक दवाओं पर खुदरा विक्रेता मूल्य (पीटीआर) और अधिकतम खुदरा मूल्य (एमआरपी) में भारी अंतर पर मंगलवार को एक बार फिर सवाल उठाए। कोर्ट ने कैंसर की दवाओं पर अस्पतालों द्वारा 10 गुना तक कीमत बढ़ाए जाने पर चिंता जताते हुए कहा यह कत्लेआम है।
शीर्ष अदालत ने पूछा कि दवा के खुदरा विक्रेता मूल्य से अधिकतम खुदरा मूल्य 16 प्रतिशत से ज्यादा नहीं रखने का एक समान नियम क्यों नहीं बनाया जाना चाहिए। जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की पीठ ने दवाओं की कीमतों के नियमन, जेनेरिक दवाएं लिखे जाने तथा औषधि मूल्य आदेश, 2013 के अंतर्गत चिकित्सा उपकरणों के मूल्य नियंत्रण से जुड़े मामलों की सुनवाई के दौरान ये टिप्पणियां कीं।
कोर्ट ने केंद्र सरकार से इस पर भी विचार करने को कहा कि अस्पताल मरीजों को अपनी ही फार्मेसी या निर्धारित मेडिकल स्टोर से दवाएं खरीदने के लिए बाध्य करते हैं। कोर्ट ने कहा कि इस व्यवस्था का सबसे ज्यादा नुकसान आम आदमी को होता है।
जस्टिस मेहता ने कैंसर दवा के मूल्यों का जिक्र करते हुए कहा यह बिल्कुल साफ तौर पर कल्तेआम है। उन्होंने कैंसर की एक दवा के अधिकतम खुदरा मूल्य का जिक्र किया जिसमें करीब 23,000 रुपये की दवा थी जबकि उसकी रिटेलर को दी जाने वाली कीमत करीब 3000 रुपये थी।
जस्टिस मेहता ने कहा कि कारपोरेट अस्पताल किसी को नहीं छोड़ते। वे मृत व्यक्ति के शव को भी बाहर ले जाने की अनुमति नहीं देते। फार्मा क्षेत्र को कोई चिंता नहीं है।सुनवाई की शुरुआत में केंद्र सरकार की ओर से पेश सालिसिटर जनरल तुषार मेहता ने समस्या की गंभीरता को स्वीकार करते हुए कहा कि सभी पक्षों के हितों में संतुलन स्थापित करने वाला समाधान तलाशना होगा।
उन्होंने मामले पर अधिकारियों के साथ विचार-विमर्श के लिए कोर्ट से कुछ समय मांगा। लेकिन कोर्ट ने सुनवाई के दौरान दवाओं में जरूरी और गैर-जरूरी दवाओं के अंतर पर भी सवाल उठाया। कोर्ट ने कहा कि यह जरूरी और गैर-जरूरी का अंतर क्यों है। सभी दवाओं पर एमआरपी पर 16 प्रतिशत मार्जिन क्यों नहीं रखा जा सकता।
कोर्ट ने कहा कि सोचिए इसका असर किस पर पड़ता है। अंतत: बोझ करदाताओं पर पड़ता है। कारपोरेट अस्पतालों में एक जरूरी कैंसर की दवा का एमआरपी 27,000 रुपये था, जबकि खुदरा विक्रेता को वही दवा 2700 रुपये में मिल रही है। सालिसिटर जनरल से कहा कि आप बस इस अंतर को देखिये।
सालिसिटर जनरल ने कहा कि उन्हें इस मुद्दे पर अधिकारियों से चर्चा करनी होगी और उन्होंने माना कि इस बात पर ध्यान देने की जरूरत है। जस्टिस मेहता ने सरकार से यह भी देखने को कहा कि कारपोरेट अस्पताल मरीजों को अपने ही मेडिकल स्टोर या किसी खास फार्मेसी से दवा खरीदने के लिए बाध्य करते हैं।
यदि मरीज बाहर से दवा खरीदता है तो कथित तौर पर अस्पताल जिम्मेदारी लेने से इन्कार कर देते हैं। कोर्ट ने पूछा कि यदि वह मरीज किसी सरकारी योजना के तहत इलाज करा रहा हो, तो भुगतान कौन करता है। करदाता करता है। तो फिर समान मानदंड क्यों नहीं होना चाहिए।
उन्होंने कहा कि डीपीसीओ में 16 प्रतिशत मार्जिन का प्रविधान है। प्रत्येक दवा आवश्यक वस्तु अधिनियम के दायरे में आती है। हमें समझ नहीं आता कि उन्हें इस तरह की कीमतें तय करने के लिए क्यों कहा जाता है। जस्टिस मेहता ने कहा कि यदि कोई संवेदनशील फार्मेसिस्ट जरूरतमंद मरीज को वही दवा 2700 रुपये में देने को तैयार हो जाए तो मरीज यह सोचने लगेगा कि कहीं दवा नकली या मिलावटी तो नहीं है। उन्होंने सवाल किया कि यह 10 गुना कीमत क्यों बढ़ाई जा रही है। कोर्ट ने कहा कि वह इस मुद्दे की पूरी तरह जांच करेगा। मामले में 12 अक्टूबर को फिर सुनवाई होगी
