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'देरी का नतीजा देख चुके हैं', TMC से जुड़े मामले की सुनवाई में सुप्रीम कोर्ट ने क्यों किया शिवसेना का जिक्र?

Published: Thu, 24 Sep 2026 03:50 PM (IST)

सुप्रीम कोर्ट ने TMC के नाम और सिंबल विवाद में चुनाव आयोग को रोजाना सुनवाई का निर्देश दिया है। कोर्ट ...और पढ़ें

सुप्रीम कोर्ट।

सुप्रीम कोर्ट।

HighLights

  1. सुप्रीम कोर्ट ने चुनाव चिह्न विवादों में देरी को नुकसानदेह बताया।

  2. ममता बनर्जी ने टीएमसी नाम-चिह्न फ्रीज करने को चुनौती दी।

  3. न्यायालय ने शिवसेना विवाद का जिक्र कर देरी के परिणाम बताए।

डिजिटल डेस्क, नई दिल्ली। राजनीतिक दलों के नाम और चुनाव चिह्न पर होने वाले विवादों को लेकर गुरुवार को सुप्रीम कोर्ट ने एक बेहद अहम टिप्पणी की है। शीर्ष अदालत ने कहा है कि ऐसे मामलों के समाधान में देरी होना चुनावी प्रक्रिया के लिए बेहद नुकसानदेह है।

बता दें कि सर्वोच्च न्यायालय की यह टिप्पणी ममता बनर्जी की उस याचिका पर सुनवाई के दौरान आई, जिसमें उन्होंने चुनाव आयोग के उस फैसले को चुनौती दी है जिसके तहत तृणमूल कांग्रेस (TMC) के नाम और उसके 'घास-फूल' चुनाव चिह्न को फ्रीज कर दिया गया था।

पहले समझिए क्या है पूरा मामला?

गौर करने वाली बात यह है कि पिछले विधानसभा चुनाव में हार और उसके बाद नेताओं के एक बड़े हिस्से द्वारा ऋतब्रत बनर्जी के पाले में जाने के बाद तृणमूल कांग्रेस में दो धड़े बन गए थे। कुछ नेता ममता बनर्जी के साथ बने रहे। इसी आंतरिक कलह और टूट के बाद चुनाव आयोग ने टीएमसी का नाम और चुनाव चिह्न फ्रीज कर दिया था और दोनों गुटों को अलग-अलग अस्थायी नाम और सिंबल दे दिए थे।

फिर क्या? ममता बनर्जी की तरफ से पेश वरिष्ठ वकील कपिल सिब्बल ने कोर्ट को बताया कि चुनाव आयोग का यह आदेश तब आया जब चुनावी प्रक्रिया पहले ही शुरू हो चुकी थी। उन्होंने नंदग्राम और रेजीनगर विधानसभा उपचुनावों का हवाला दिया, जो क्रमश- 6 और 9 अक्टूबर को होने वाले हैं।

सुप्रीम कोर्ट ने शिवसेना का जिक्र क्यों किया?

इस बात को ऐसे समझिए कि मामले में सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने माना कि चूंकि चुनाव शुरू हो चुके हैं, इसलिए वह इस वक्त चुनावी प्रक्रिया में दखल नहीं दे सकता। हालांकि, चीफ जस्टिस सूर्यकांत ने कहा कि इस अंतरिम आदेश पर त्वरित निस्तारण के लिए चुनाव आयोग को रोज सुनवाई करने का निर्देश दिया जा सकता है।

हालांकि पूरे मामले में गौर करने वाली बात यह रहा कि सुनवाई के दौरान न्यायमूर्ति जॉयमलय बागची ने महाराष्ट्र की शिवसेना का जिक्र किया और कहा कि हमने देखा है कि देरी करने से क्या परिणाम होते हैं।

कौन से विवाद की ओर था इशारा?

गौरतलब है कि न्यायमूर्ति बागची का इशारा शिवसेना के उस विवाद की ओर था, जहां एकनाथ शिंदे और उद्धव ठाकरे गुट के बीच पार्टी के नाम और 'धनुष-बाण' चुनाव चिह्न को लेकर लंबी कानूनी लड़ाई चली थी और यह सवाल उठा था कि क्या केवल विधायी बहुमत को ही पार्टी की असली ओनरशिप का पैमाना माना जा सकता है?