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यह एक आर्काइव लेख है, जिसे Sep 07, 2022 को प्रकाशित किया गया था। इसमें दी गई जानकारी वर्तमान समय के लिहाज से पुरानी हो सकती है।

Supreme Court on Hijab Row: सुप्रीम कोर्ट ने कहा- किसी को हिजाब पहनने से रोका नहीं जा रहा, सवाल स्कूल में पहनने का

By Krishna Bihari SinghEdited By:
Published: Wed, 07 Sep 2022 06:42 PM (IST)Updated: Wed, 07 Sep 2022 11:33 PM (IST)

हिजाब मामले में सुप्रीम कोर्ट में बुधवार को जमकर बहस और सवाल जवाब हुए। मामले की सुनवाई के दौरान सुप्रीम ...और पढ़ें

उच्चतम न्यायालय (Supreme Court) ने बुधवार को भी हिजाब मामले पर सुनवाई की।
उच्चतम न्यायालय (Supreme Court) ने बुधवार को भी हिजाब मामले पर सुनवाई की।

जागरण ब्यूरो, नई दिल्ली। कर्नाटक के स्कूलों में हिजाब पर रोक लगाने के मामले में बुधवार को हुई सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने टिप्पणी करते हुए कहा कि किसी को हिजाब पहनने से नहीं रोका जा रहा। यहां सवाल सिर्फ स्कूल में पहनने का है। मामले में गुरुवार को भी सुनवाई जारी रहेगी। कई मुस्लिम लड़कियों ने सुप्रीम कोर्ट में याचिकाएं दाखिल कर कर्नाटक हाई कोर्ट के फैसले को चुनौती दी है।

हाई कोर्ट ने कर्नाटक के स्कूलों में हिजाब पर रोक के सरकारी आदेश को सही ठहराया था। साथ ही कोर्ट ने कहा था कि हिजाब इस्लाम का अभिन्न हिस्सा नहीं है। सुप्रीम कोर्ट में जस्टिस हेमंत गुप्ता और सुधांशु धूलिया की पीठ आजकल मामले पर सुनवाई कर रही है।

याचिकाकर्ता मुस्लिम छात्राओं की ओर से बुधवार को दलीलें दी गईं कि स्कूल यूनिफार्म के रंग का हिजाब पहनने में क्या हर्ज है। हिजाब पहनने वाली लड़कियों को स्कूल में प्रवेश करने से रोका जाता है जिससे उन्हें संविधान के अनुच्छेद 19, 21 और 25 में मिले मौलिक अधिकारों का उल्लंघन होता है उनका शिक्षा का अधिकार प्रभावित होता है।

याचिकाकर्ता आशिया शिफा की ओर से बहस करते हुए वरिष्ठ वकील देवदत्त कामथ ने कहा कि वह यूनिफार्म के खिलाफ नहीं हैं और न ही उन्होंने उसे चुनौती दी है। उन्होंने उस सरकारी आदेश को चुनौती दी है जिसमें हिजाब पहनने पर रोक है।

कामथ ने कहा कि यूनिफार्म के साथ उसी रंग का हिजाब पहनने में क्या हर्ज है। इससे कौन से नियम का उल्लंघन हो जाता है। वे सिर्फ हिजाब पहनने की इजाजत मांग रहे हैं बुर्का या जिलबाब (पूरा शरीर ढकने वाली ड्रेस जिसे मुस्लिम महिलाएं पहनती हैं) की नहीं। कामथ ने रीजनेबल एक्मोडेशन यानी तर्कसंगत संयोजन के सिद्धांत की दुहाई दी।

कामथ ने कहा कि हिजाब पहन कर जाने पर लड़कियों को स्कूल में प्रवेश से रोका जाता है। राज्य सरकार का आदेश एक समुदाय विशेष के खिलाफ है। इस दलील पर पीठ ने कहा ये सही नहीं है क्योंकि एक ही समुदाय है जो हिजाब पहन कर आना चाहता है दूसरे समुदाय ड्रेस कोड का पालन कर रहे हैं। कामथ ने कहा कि एक समुदाय की बात नहीं है अन्य धर्म के छात्र भी धार्मिक चिह्नों को धारण करते हैं।

दक्षिण भारत में लोग संध्या वंदन करते हैं चिह्न धारण करते हैं। रुद्राक्ष पहनते हैं। कुछ क्रास पहनते हैं। जस्टिस हेमंत गुप्ता ने कहा कि रुद्राक्ष और क्रास शर्ट के अंदर पहना जाता है उससे यूनिफार्म के नियम का उल्लंघन नहीं होता। जस्टिस गुप्ता ने कहा कि ऐसे ही यज्ञोपवीत होता है जो कपड़ों के अंदर पहना जाता है।

कामथ ने अपनी दलीलें जारी रखते हुए सुप्रीम कोर्ट के एक पूर्व फैसले का हवाला देते हुए कहा कि राइट टु ड्रेस अभिव्यक्ति की आजादी के अधिकार का हिस्सा है। इस पर जस्टिस गुप्ता ने कहा कि आप इस दलील को लाजिकल इंड तक नहीं ले जा सकते क्योंकि राइट टु ड्रेस में राइट टु अनड्रेस भी शामिल है।

कामथ ने कहा कि वह इस तरह की बात नहीं कर रहे। स्कूल में कोई अनड्रेस नहीं होता। यहां सवाल सिर्फ इतना है कि यूनिफार्म के साथ हिजाब पहनना अनुच्छेद 19 के तहत आएगा और क्या इस पर रोक लगाई जा सकती है।

कामथ ने मामले को पांच जजों की संविधान पीठ को भेजने का भी अनुरोध किया। उन्होंने धार्मिक चिह्नों को पहनने के बारे में दुनिया के अन्य देशों जैसे द.अफ्रीका, कनाडा, अमेरिका और इंग्लैंड की अदालतों के फैसलों का हवाला दिया।

कोर्ट ने कहा कि वे विदेशी फैसलों का हवाला न दें। वहां के फैसले वहां की संस्कृति और परिस्थितियों के आधार पर होंगे। वे भारत की बात करें। जस्टिस गुप्ता ने कहा कि जितनी विभिन्नता हमारे देश में है उतनी दुनिया के और किसी देश में नहीं है और सभी देशों में नागरिकों के लिए समान कानून हैं।