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अब घूस लेने पर नहीं बचेंगे सरकारी ऑफिसर, SC का आदेश- रिश्वतखोरी के आरोपों की जांच के लिए मंजूरी जरूरी नहीं

Published: Mon, 19 Oct 2026 08:30 PM (IST)

सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि लोक सेवक के खिलाफ रिश्वत मांगने के आरोप की जांच के लिए पूर्व मंजूरी की आवश्यकता नहीं है।

रिश्वत जांच के लिए पूर्व मंजूरी आवश्यक नहीं: सुप्रीम कोर्ट

रिश्वत जांच के लिए पूर्व मंजूरी आवश्यक नहीं: सुप्रीम कोर्ट

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डिजिटल डेस्क, नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि भ्रष्टाचार रोकथाम अधिनियम के तहत किसी लोक सेवक द्वारा कथित तौर पर रिश्वत मांगने की जांच के लिए पूर्व मंजूरी लेना जरूरी नहीं है। शीर्ष अदालत का कहना है कि यह काम आधिकारिक कर्तव्यों के निर्वहन से जुड़ा नहीं है, जिसे कानून के तहत संरक्षण प्राप्त है।

जस्टिस एसवीएन भट्टी और जस्टिस एनवी अंजारिया की पीठ ने 16 अक्टूबर के फैसले में यह टिप्पणी की। पीठ ने राजस्थान पुलिस के एक कांस्टेबल तेजाराम की उस अपील को खारिज कर दिया, जिसमें उसने अपने विरुद्ध भ्रष्टाचार का आरोप तय किए जाने को चुनौती दी थी।

रिश्वत जांच के लिए पूर्व मंजूरी आवश्यक नहीं: सुप्रीम कोर्ट

पीठ की ओर से फैसला लिखते हुए जस्टिस अंजारिया ने राजस्थान हाई कोर्ट के फैसले को बरकरार रखा, जिसमें उसने तेजाराम के विरुद्ध भ्रष्टाचार रोकथाम अधिनियम की धारा-सात के तहत आरोप तय करने के निचली अदालत के आदेश में हस्तक्षेप से इन्कार कर दिया था।

अधिनियम की धारा-सात में उन लोक सेवकों को दंडित करने का प्रविधान है जो किसी सरकारी दायित्व का निर्वहन करने के लिए अनुचित लाभ स्वीकार करते हैं या स्वीकार करने की कोशिश करते हैं। इस धारा को 2018 में संशोधित किया गया था।

शीर्ष अदालत ने कांस्टेबल की यह दलील खारिज कर दी कि जांच एजेंसी ने अधिनियम की धारा-17ए के तहत जांच या पूछताछ के लिए पूर्व मंजूरी नहीं ली थी। यह धारा लोक सेवकों के आधिकारिक कार्यों के निर्वहन के दौरान लिए गए फैसलों या अनुशंसा से जुड़े कुछ अपराधों की जांच या पूछताछ से संबंधित है।

तेजाराम कांस्टेबल की अपील खारिज

शीर्ष अदालत ने विभिन्न फैसलों का हवाला देते हुए कहा कि गबन, खातों में हेराफेरी, धोखाधड़ी, आपराधिक विश्वासघात और रिश्वत लेने जैसे अपराध इस प्रविधान के दायरे में नहीं आते।

दस्तावेज के अनुसार, तेजाराम सिरोही में पुलिस उपाधीक्षक कार्यालय में तैनात था। एक अन्य कांस्टेबल देवेंद्र कुमार ने 22 अप्रैल, 2021 को ई-मेल के जरिये शिकायत की थी कि तेजाराम ने पुलिस अधीक्षक की ओर से 1.5 लाख रुपये की मांग की थी।

चार जून, 2021 को भ्रष्टाचार रोकथाम अधिनियम की धारा-7ए और भारतीय दंड संहिता की धारा-120बी (आपराधिक साजिश) के तहत एफआइआर दर्ज की गई। तेजाराम को एक सितंबर, 2021 को गिरफ्तार किया गया था।

आठ दिसंबर, 2023 को अभियोजन की मंजूरी मिलने के बाद 19 जनवरी, 2024 को आरोप-पत्र दाखिल किया गया था। पाली की विशेष अदालत ने 12 सितंबर, 2024 को भ्रष्टाचार रोकथाम अधिनियम की धारा-सात के तहत आरोप तय किया।

तेजाराम ने इस आदेश को हाई कोर्ट में चुनौती दी थी। हाई कोर्ट ने 26 मार्च, 2025 को उसकी पुनरीक्षण याचिका खारिज कर दी, जिसके बाद उसने शीर्ष अदालत का रुख किया था।

(न्यूज एजेंसी पीटीआई के इनपुट के साथ)