'दो साल पुराना बकाया नहीं वसूल सकती बिजली कंपनी', सुप्रीम कोर्ट ने दिया महत्वपूर्ण फैसला
सुप्रीम कोर्ट ने बिजली बिल के पुराने बकाए की वसूली पर महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है, जिसमें कहा गया है कि सामान्यतः दो साल के भीतर बकाया वसूला जाना चाहिए

बिजली अधिनियम की धारा 56(2) हर स्थिति में दो साल बाद किसी सप्लीमेंट्री डिमांड पर पूर्ण रोक नहीं लगाती

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जागरण ब्यूरो, नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट ने बिजली के पुराने बकाए की वसूली के बारे में महत्वपूर्ण फैसला दिया है। कोर्ट ने कहा है कि सामान्य तौर पर बिजली की खपत से जुड़ा कोई बिल दो साल के भीतर वसूला जाना चाहिए। दो साल की अवधि के बाद भी बकाया वसूलने के लिए उस रकम को लगातार बिजली बिलों में बकाया के तौर पर दिखाया जाना जरूरी है।
ऐसा नहीं रहने पर दो साल से अधिक पुरानी वसूली पर रोक रहेगी। फैसले से स्पष्ट होता है कि बिजली बकाए से जुड़े मामलों में सिर्फ वर्षों बाद एक मुश्त मांग खड़ी कर देना पर्याप्त नहीं है। यह भी देखना होगा कि रकम कब पहली बार देय हुई, उसका बिल कब जारी हुआ और क्या बाद के बिलों में उसे लगातार बकाए के रूप में दर्शाया गया।
हालांकि कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया है कि बिजली अधिनियम की धारा 56(2) हर स्थिति में दो साल बाद किसी सप्लीमेंट्री डिमांड पर पूर्ण रोक नहीं लगाती। ये फैसला जस्टिस एसवीएन भट्टी और जस्टिस एनवी अंजारिया की पीठ ने दक्षिणांचल विद्युत वितरण निगम लिमिटेड के मामले में दिया है। कोर्ट ने बिजली कंपनी की अपील खारिज कर दी है।
ये मामला करीब 57.74 लाख रुपये के न्यूनतम खपत गारंटी शुल्क की मांग से जुड़ा था। यह मांग फरवरी से सितंबर 1998 की अवधि के लिए 13 फरवरी 2007 यानी नौ साल बाद की गई थी। मामले में उपभोक्ता ने 4000 केवीए बिजली लोड के लिए आवेदन किया था, लेकिन उस समय बिजली उपलब्धता की स्थिति के कारण कंपनी ने 2000 केवीए ही स्वीकृत किया।
बाद में कंपनी ने 2000 केवीए उपलब्ध होने की बात कहते हुए उपभोक्ता को इसकी पेशकश की लेकिन उपभोक्ता ने सितंबर 1998 में अतिरिक्त आपूर्ति लेने में रुचि नहीं दिखाई। बावजूद कंपनी ने 1998 की अवधि के लिए 57.74 लाख रुपये न्यूनतम खपत गारंटी शुल्क की मांग कर दी। बिजली लोकपाल ने मांग रद करते हुए पाया कि अतिरिक्त 2000 केवीए के लिए उपभोक्ता ने सहमति नहीं दी थी।
और ऐसा कोई रिकॉर्ड भी नहीं था कि अतिरिक्त लोड वास्तव में उसे जारी किया गया। इलाहाबाद हाई कोर्ट ने भी लोकपाल के फैसले को सही माना। सुप्रीम कोर्ट ने हाई कोर्ट के फैसले में हस्तक्षेप करने से इनकार कर दिया। कोर्ट ने कहा कि किसी उपभोक्ता से बकाया रकम दो साल की अवधि के बाद तभी वसूली जा सकती है जब उसे लगातार बिजली के बकाए के रूप में बिल में दर्शाया गया हो।
केवल यह दावा कर देना पर्याप्त नहीं है कि रकम पहले से बकाया थी। बिजली कंपनी को अपने नियमित बिलों में उस रकम को लगातार बकाए के तौर पर दिखाना होगा।
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