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यूपी-राजस्थान के सरकारी स्कूलों में बिना इजाजत वीडियोग्राफी पर जारी रहेगी रोक, SC का याचिका पर सुनवाई से इनकार

Published: Thu, 03 Sep 2026 11:45 AM (GMT+05:30)

सुप्रीम कोर्ट ने उत्तर प्रदेश और राजस्थान के सरकारी स्कूलों में बाहरी लोगों के प्रवेश और वीडियोग्राफी पर लगी रोक ...और पढ़ें

सुप्रीम कोर्ट ने याचिका पर सुनवाई से किया इनकार। (फाइल फोटो।)

सुप्रीम कोर्ट ने याचिका पर सुनवाई से किया इनकार। (फाइल फोटो।)

HighLights

  1. सुप्रीम कोर्ट ने याचिका पर सुनवाई से किया इनकार।

  2. यूपी-राजस्थान के स्कूलों में वीडियोग्राफी पर रोक जारी।

  3. बाहरी लोगों को प्रवेश के लिए लेनी होगी अनुमति।

डिजिटल डेस्क, नई दिल्ली। उत्तर प्रदेश और राजस्थान में सरकारी स्कूलों में बाहरी लोगों, पत्रकारों, यूट्यूबर्स, सोशल मीडिया यूजर्स और सिविल सोसाइटी के प्रतिनिधियों के प्रवेश पर लगाई गई पाबंदियों के मामले में सुप्रीम कोर्ट ने सख्त रुख अपनाया है। शिक्षा अधिकारियों की ओर से इस रोक को चुनौती देने वाली जनहित याचिका डाली गई, जिस पर कोर्ट ने सुनवाई करने से इनकार कर दिया।

प्रिया मिश्रा की याचिका पर जस्टिस पीएस नरसिम्हा और जस्टिस आलोक अराधे की बेंच ने सुनवाई की और इसे सुनने से इनकार कर दिया। कोर्ट ने कहा, "हम भारत के संविधान के अनुच्छेद 32 के तहत दायर रिट याचिका पर विचार करने के इच्छुक नहीं हैं।"

सीजेपी का स्कूल ठीक करो अभियान

यह याचिका कॉकरोच जनता पार्टी के स्कूल ठीक करो अभियान के चलते अहम हो गई है, जिसका मकसद सरकारी स्कूलों के इंफ्रास्ट्रक्चर में कमियों को उजागर करना है। इस याचिका में खास तौर पर राजस्थान के सेकेंडरी एजुकेशन डायरेक्टर द्वारा 16 अगस्त, 2026 को जारी किए गए एक सर्कुलर को चुनौती दी गई है।

इस सर्कुलर के तहत बाहरी लोगों को सरकारी स्कूलों के परिसर में घुसने से पहले प्रिंसिपल से पहले से इजाजत लेनी जरूरी है। इसमें फोटोग्राफी, वीडियोग्राफी, इंटरव्यू, ऑडियो रिकॉर्डिंग और लाइव-स्ट्रीमिंग के लिए भी पहले से लिखित इजाजत लेने की जरूरत है।

उत्तर प्रदेश के मामले में याचिका में अयोध्या के जिला बेसिक शिक्षा अधिकारी द्वारा 19 अगस्त को जारी किए गए एक आदेश का जिक्र है। इस आदेश में कहा गया है कि बाहरी लोग, यूट्यूबर और सोशल मीडिया से जुड़े लोग सक्षम अधिकारी की मंज़ूरी के बिना काउंसिल स्कूलों में न तो प्रवेश करें और न ही फोटो या वीडियो लें।

याचिका में बताया गया है कि आजमगढ़, बलिया, बस्ती, बलरामपुर, शामली और आगरा समेत कई अन्य जिलों में भी इसी तरह के निर्देश जारी किए गए थे।

याचिका में क्या तर्क दिया गया?

याचिकाकर्ता ने तर्क दिया कि ये पाबंदियां संविधान के अनुच्छेद 14, 19(1)(a), 19(1)(g), 21 और 21-A के तहत मिले मौलिक अधिकारों का उल्लंघन करती हैं। यह तर्क दिया गया कि बोलने और अभिव्यक्ति की आजादी में सही पत्रकारिता और सार्वजनिक संस्थानों से जुड़ी जानकारी फैलाना शामिल है, साथ ही यह भी माना गया कि बच्चों की प्राइवेसी, सम्मान और सुरक्षा की रक्षा करना राज्य की जिम्मेदारी है।

याचिकाकर्ता का तर्क था कि पहचान योग्य बच्चों की रिकॉर्डिंग करने और सरकारी स्कूल की भौतिक स्थिति का दस्तावेजीकरण करने के बीच अंतर है। याचिका के अनुसार, बच्चों की सुरक्षा के लिए लगाई गई पाबंदियों के कारण क्लासरूम, इमारतों, शौचालयों, पीने के पानी की सुविधाओं, बिजली, मिड-डे मील और अन्य बुनियादी सुविधाओं का जनहित में दस्तावेजीकरण नहीं रुकना चाहिए।

याचिकाकर्ता ने सुप्रीम कोर्ट से राजस्थान और उत्तर प्रदेश के उन आदेशों को रद करने का आग्रह किया जिनमें पूरी तरह से पाबंदियां लगाई गई हैं और यह निर्देश देने की मांग की कि जनहित से जुड़े दस्तावेजों के किसी भी नियमन में तर्कसंगतता, आवश्यकता और आनुपातिकता की कसौटियों का पालन किया जाए।

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