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CEC और चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति से जुड़े कानून की वैधता पर SC का फैसला बंटा, क्या है पूरा मामला?

Published: Wed, 23 Sep 2026 02:57 PM (IST)

सुप्रीम कोर्ट ने मुख्य चुनाव आयुक्त और अन्य चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति प्रक्रिया को नियंत्रित करने वाले कानून को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर बंटा हुआ फैसला सुनाया।

चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति पर सुप्रीम कोर्ट का बंटा हुआ फैसला। (फाइल फोटो।)

चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति पर सुप्रीम कोर्ट का बंटा हुआ फैसला। (फाइल फोटो।)

HighLights

  1. सुप्रीम कोर्ट ने नियुक्ति कानून पर बंटा हुआ फैसला दिया।

  2. जस्टिस दत्ता ने संविधान पीठ को भेजने से इनकार किया।

  3. जस्टिस शर्मा ने संविधान पीठ को भेजने का समर्थन किया।

डिजिटल डेस्क, नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार को मुख्य चुनाव आयुक्त (CEC) और अन्य चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति प्रक्रिया को नियंत्रित करने वाले कानून को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर बंटा हुआ फैसला सुनाया। जस्टिस दीपांकर दत्ता ने इसे संविधान पीठ के पास भेजने की मांग को खारिज कर दिया, जबकि जस्टिस एससी शर्मा ने इससे असहमति जताई और इसे संविधान पीठ के पास भेजने का समर्थन किया।

फैसला सुनाते हुए जस्टिस दीपांकर दत्ता ने कहा कि यह एक बंटा हुआ फैसला था, क्योंकि इस मामले में सुप्रीम कोर्ट की बेंच की राय बंटी हुई थी। जस्टिस दत्ता ने कहा कि याचिकाओं पर पांच दिनों से ज्यादा समय तक सुनवाई हुई थी और संस्थागत एकजुटता के हित में कोर्ट का एक ही राय रखना बेहतर होता।

जस्टिस दीपांकर दत्ता ने इस बात पर दिया जोर

जस्टिस दीपांकर दत्ता और जस्टिस सतीश चंद्र शर्मा की दो जजों वाली बेंच इस बात पर सहमत नहीं थी कि मामले को आगे भेजा जाए या नहीं लेकिन आखिरकार उन्होंने आदेश दिया कि मामले में और देरी से बचने के लिए इसे सीजेआई के सामने रखा जाए, ताकि सही संख्या वाली 'कॉन्स्टिट्यूशन बेंच' (संविधान पीठ) का गठन किया जा सके।

बेंच ने माना कि इस बात की जांच करने के लिए कि क्या 'कॉन्स्टिट्यूशन बेंच' को मामला भेजना सही है या नहीं, अगर इसे 3 जजों की बेंच को भेजा जाता है तो कार्यवाही में बेवजह देरी होगी।

हालांकि, उन्होंने माना कि बेंच अलग-अलग नतीजों पर पहुंची थी, इसलिए उन्हें ज्यादा विस्तार से अपनी राय लिखनी पड़ी। उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि संवैधानिक ढांचा इस सिद्धांत पर आधारित है कि सरकार व्यक्तियों के बजाय कानूनों से चलती है और सत्ता का इस्तेमाल करने वाले भी कानून के दायरे में रहते हैं।

जस्टिस दत्ता ने कहा कि किसी न्यायिक राय के महत्व को सिर्फ उस समय के विवाद के संदर्भ में नहीं देखा जाना चाहिए, क्योंकि कोर्ट की टिप्पणियों का असर मौजूदा मामले से कहीं आगे तक हो सकता है। खास तौर पर जजों की नियुक्ति का जिक्र करते हुए उन्होंने कहा कि एक आम गलतफहमी को दूर करना जरूरी है।

उनके मुताबिक, यह दावा कि जज ही जजों की नियुक्ति करते हैं एक मिथक है। इसे कुछ खास हितों और मकसद से फैलाई गई बातों के जरिए बढ़ावा दिया गया है और अक्सर भारत में जजों की नियुक्ति से जुड़े विवादित फैसलों का हवाला देकर ऐसा किया जाता है।

जनहित याचिका में क्या कहा गया?

जनहित याचिका (PIL) में कहा गया है कि पैनल से सीजेआई को बाहर रखने से नियुक्ति प्रक्रिया की स्वतंत्रता कमजोर होती है। इस कानून को कांग्रेस नेता जया ठाकुर और एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स (एडीआर) सहित कई याचिकाकर्ताओं ने चुनौती दी है।

क्या है कानून?

दिसंबर 2023 में संसद द्वारा पारित यह कानून सुप्रीम कोर्ट के उस अहम फैसले के कुछ महीनों बाद आया जिसमें कोर्ट ने निर्देश दिया था कि चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति प्रधानमंत्री, विपक्ष के नेता (LoP) और मुख्य न्यायाधीश (CJI) वाली एक समिति द्वारा की जाए।

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