नई दिल्ली, नीलू रंजन। दया याचिकाओं पर सुनवाई में देरी के आधार पर फांसी की सजा को आजीवन कारावास में तब्दील करने के सुप्रीम कोर्ट के फैसले केंद्र सरकार के गले नहीं उतर रहे हैं। गृह मंत्रालय के एक वरिष्ठ अधिकारी ने कहा कि देश के सर्वोच्च संवैधानिक प्रमुख राष्ट्रपति के लिए दया याचिकाओं को निपटाने की समयसीमा तय करना संभव नहीं है। साथ ही कई मामलों में फांसी की सजा के क्रियान्वयन के पहले कानून-व्यवस्था और आंतरिक सुरक्षा की स्थिति भी ध्यान में रखनी पड़ती है। फिलहाल गृह मंत्रालय सुप्रीम कोर्ट में पुनर्विचार याचिका दाखिल करने पर विचार कर रहा है, लेकिन जरूरत पड़ने पर संविधान संशोधन कर स्थिति साफ करने की कोशिश भी की जा सकती है।

वरिष्ठ अधिकारी ने कहा कि जिन 15 दया याचिकाओं में सुनवाई में देरी के कारण सुप्रीम कोर्ट ने मौत की सजा को आजीवन कारावास में बदला है, उनमें किसी के लिए भी गृह मंत्रालय को जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता है। जो भी देरी हुई है वह राष्ट्रपति की ओर से हुई। संविधान के अनुच्छेद-72 में राष्ट्रपति को किसी भी अपराध के लिए क्षमादान का अधिकार दिया गया है, लेकिन इसके लिए कोई समयसीमा निर्धारित नहीं की गई है। यही नहीं, संविधान में राष्ट्रपति को यह अधिकार सभी कानूनी विकल्प खत्म होने के बाद दिया गया है। जाहिर है कि जिन मामलों में सुप्रीम कोर्ट एक बार अभियुक्त को फांसी की सजा सुना चुका है, उस पर पुनर्विचार करना कानूनी रूप से सही नहीं है। सजा तय करना अदालत का अधिकार है, लेकिन उसके क्रियान्वयन का अधिकार पूरी तरह कार्यपालिका का है। वरिष्ठ अधिकारी के अनुसार किसी भी स्थिति में राष्ट्रपति को दया याचिका पर सुनवाई जल्द पूरी करने का निर्देश देना सरकार के लिए संभव नहीं है। गृह मंत्रालय की चिंता सुप्रीम कोर्ट द्वारा सामान्य अपराधियों और आतंकियों को एकसमान मानने को लेकर भी है। सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले से राजीव गांधी की हत्या के आरोपियों को भी राहत मिल गई है।

सुप्रीम कोर्ट के फैसले से सकते में आया गृह मंत्रालय फिलहाल पुनर्विचार याचिका दाखिल करने पर ही विचार कर रहा है, जिसकी जानकारी अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल सुप्रीम कोर्ट में दे भी चुके हैं। हालांकि, सुप्रीम कोर्ट के रुख को देखते हुए मंत्रालय अधिकारियों को पुनर्विचार याचिका खारिज होने की आशंका सता रही है। ऐसी स्थिति में मंत्रालय क्यूरेटिव याचिका दाखिल करेगा। नियम के मुताबिक, पुनर्विचार याचिका की सुनवाई उसी पीठ में होती है जिसने फैसला सुनाया है, जबकि क्यूरेटिव याचिका की सुनवाई केवल एक न्यायाधीश पुरानी बेंच का और तीन अन्य वरिष्ठतम जजों की पीठ करती है। जाहिर है बड़ी पीठ और नए न्यायाधीशों के सामने सुनवाई होने से गृह मंत्रालय को क्यूरेटिव याचिका में राहत की उम्मीद है। वैसे गृह मंत्रालय के अधिकारी क्यूरेटिव याचिका में भी राहत नहीं मिलने की स्थिति में संविधान संशोधन तक जाने की बात कर रहे हैं। हालांकि, अब इसका फैसला आम चुनाव के बाद नई सरकार ही करेगी।

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