नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि अदालतों को दोषी व्यक्तियों को ऐसी सजा देनी चाहिए जिससे कि किए गए अपराध के प्रति 'जनता की नफरत' नजर आए। न्यायमूर्ति टीएस ठाकुर और आर. बानुमति की एक पीठ ने कहा कि किसी भी मामले में दोषी को दी जाने वाली सजा प्रत्येक मामले की परिस्थिति के अनुरूप विवेक के आधार पर निर्भर करती है।

अदालतों का यह सुसंगत नजरिया रहा है कि अपराध की गंभीरता और सजा के बीच तार्किक अनुपात बना कर रखा जाए। कोर्ट ने कहा कि यह सही है कि किसी भी अपराध के लिए अनुपातहीन तरीके से सजा नहीं दी जानी चाहिए, लेकिन यह अदालत को अपर्याप्त सजा देने का विकल्प भी नहीं देता है। न्याय का तकाजा है कि अदालतों को अपराध के अनुरूप ही सजा देनी चाहिए ताकि अदालतें अपराध के प्रति जनता की नफरत को दर्शा सके।

कोर्ट ने हरियाणा निवासी रविन्दर सिंह की अपील पर सुनवाई के दौरान ये टिप्पणियां कीं। रविन्दर सिंह ने अपने पिता पर हुए हमले के मामले में छह व्यक्तियों की सजा कम करने के पंजाब एवं हरियाणा हाई कोर्ट के फैसले को शीर्ष अदालत में चुनौती दी थी।

अभियोजन के अनुसार 4 अगस्त, 1993 को जब शेर सिंह अपने ब़़डे बेटे दुली चंद के साथ देवसर गांव के बस अड्डे से घर लौट रहे थे तो छह व्यक्तियों प्यारे लाल, रमेश, सुरेन्द्र, राज कुमार, मनफूल और नरेंद्र ने दुली चंद पर लाठी से हमला किया।

इस हमले में दुली चंद गंभीर रूप से जख्मी हो गए थे। बाद में दुली चंद को भिवानी के जनरल अस्पताल ले जाया गया, जहां 9 अगस्त, 1993 को उनकी मृत्यु हो गई। हाई कोर्ट ने कम कर दी थी सात साल की सजा निचली अदालत ने सभी छह दोषियों को आईपीसी की धारा 304[2] [गैर इरादतन हत्या] के तहत दोषी ठहराते हुए उन्हें सात सात साल की सश्रम कैद की सजा सुनाई थी।

दोषियों ने इस फैसले को हाई कोर्ट में चुनौती दी थी। हाई कोर्ट ने उनकी सजा को जेल में बिताई गई अवधि तक घटा दिया था। इसके अलावा सभी दोषियों पर 25-25 हजार रपए का जुर्माना किया गया था।

सुप्रीम कोर्ट का फैसला

हालांकि सुप्रीम कोर्ट ने हाई कोर्ट के फैसले में हस्तक्षेप करने से इनकार करते हुए पी़डित परिवार के लिए मुआवजे की राशि ब़़ढा दी। दोषियों को एक-एक लाख रुपए के जुर्माने के साथ ही सवा लाख-सवा लाख रुपए पीड़ित परिवार को देने का निर्देश दिया।

By Murari sharan