दीपक पांडेय, जगदलपुर। बस्तर के आदिवासी कोरोना महामारी को लेकर जागरूक और सतर्क हो गए हैं। आदिवासी अपनी आस्था और परंपरा के निर्वहन में संक्रमण का खतरा नहीं बनना चाहते। यही वजह है कि वे झंडा देव, जिन्हें बीमारी भगाने में मददगार मानते रहे हैं, उनकी पूजा करने भी नहीं जा रहे हैं।

बीमारी भगाने वाले झंडा देव के पूजा-अनुष्ठान से भी बनाई दूरी

बस्तर के हर गांव में एक देवगुड़ी होती है। हर गांव के एक विशिष्ट देवी या देवता होते हैं। गांव के पुजारी यहां हर खास मौके पर अनुष्ठान करते हैं। हर गांव के देवी देवता भले अलग रहते हैं पर एक देव ऐसे हैं जो हर गांव में होते हैं। उन्हें झंडा देव कहा जाता है। देवगुड़ी के बाहर एक सफेद झंडा गड़ा होता है। इसे ही झंडा देव माना जाता है। झंडा देव को स्वास्थ्य का देवता माना जाता है।

झंडा देव का अनुष्‍ठान नहीं कर रहे आदिवासी 

बीमारी होने पर झंडा देव की पूजा कर मुर्गे, बकरे, सूअर आदि की बलि दी जाती है और महुए की शराब चढ़ाई जाती है। कोरोना आदिवासियों के लिए बड़ा संकट लेकर आया है, लेकिन इसे जागरूकता ही कहेंगे कि इस महासंकट में भी आदिवासी शारीरिक दूरी और लॉकडाउन तोड़ना नहीं चाहते। वहीं अभी तक बस्तर में अब तक कोरोना का एक भी पॉजिटिव नहीं मिला है यही कारण है कि इस महामारी में झंडा देव के लिए अनुष्ठान भी नहीं कर रहे हैं।

झंडा देव गांव के रक्षक

बस्तर जिले के बकावंड ग्राम के झंडा पुजारी बिरजो कश्यप ने बताया कि झंडा देव गांव के रक्षक की भूमिका निभाते हैं। प्राकृतिक आपदा, कीट प्रकोप, बीमारी, महामारी से ग्रामीणों की रक्षा का काम झंडा देव का है, इसलिए गांव में अन्य देवी-देवताओं की जात्रा, मेला-मड़ई के पहले झंडा देव की पूजा होती है। इस साल झंडा देव का वार्षिक अनुष्ठान जनवरी माह में हो गया है।

उन्होंने बताया कि जब महामारी फैलती है तो गांव में एक के बाद एक मौतें होने लगती हैं तो ग्रामीण झंडा देव की शरण में पहुंचते हैं। अभी बस्तर में कोरोना को लेकर लॉकडाउन तो है पर लोगों के बीमार पड़ने या मौत जैसी कोई बात नहीं है ग्रामीण सतर्कता बरत रहे हैं। प्रशासन भी उपाय कर रहा है जिससे ग्रामीणों में कोरोना को लेकर डर तो है पर दहशत जैसी कोई बात नहीं है। वहीं झंडा देव की रोजना पूजा-अर्चना भी एक-दो लोगों से किया जा रहा है।

हैजा फैला था तो तीन दिन हुआ था अनुष्ठान

बकावंड के पूर्व उपसरपंच बलियार मौर्य ने बताया कि वर्ष 1974-75 में वे 11 साल के थे तब इलाके में हैजा फैला था। बकावंड में भी हर घर में एक के बाद एक मौत हो रही थी। घर वाले एक का शव बाहर जंगल में फेंक कर आते थे तो रास्ते में दूसरा शव लेकर आते लोगों को देखते है। इन हालात में गांव के झंडा देव में तीन दिन तक लगातार अनुष्ठान चला जिसके बाद महामारी कुछ नियंत्रित हुई थी। उन्होंने बताया उस समय गांव में स्वास्थ्य महकमा की पहुंच नहीं थी ग्रामीण पढ़े-लिखे ज्यादा नहीं थे इसलिए बीमार पड़ने पर देसी उपचार के साथ देवी-देवता की शरण में जाते थे। झंडा देव गांव की सरहद पर खुले मैदान में होता था ताकि वहां लोग दूर-दूर तक बैठकर अनुष्ठान में सहभागी बनने के बाद मांझी, मुखिया, पुजारी द्वारा बताए गए सुरक्षात्मक उपायों पर अमल करें।

 

Posted By: Arun Kumar Singh

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