नई दिल्‍ली [जागरण स्‍पेशल]। आगामी 23 सितंबर को न्यूयार्क में यूनाइटेड नेशन क्लाइमेट एक्शन समिट होने जा रही है। दुनिया की सबसे बड़ी समस्या बन चुके जलवायु परिवर्तन पर देशों द्वारा प्रभावी कदम उठाए जाने को लेकर छात्रों का एक विश्वव्यापी आंदोलन चल रहा है। हैशटैग (#) फ्राइडेज फॉर फ्यूचर नामक इस आंदोलन के तहत दुनिया के 2000 शहरों के छात्र कक्षाओं से निकलकर सड़कों पर आ चुके हैं। इसी मकसद से इसके समानांतर एक आंदोलन ग्लोबल हैशटैग क्लाइमेट स्ट्राइक भी चल रहा है जिसमें दुनिया के लाखों लोग शामिल होकर छात्रों की इस नेक पहल को मजबूती दे रहे हैं। 20 सितंबर से 27 सितंबर तक ये दोनों आंदोलन दुनिया भर में चलाए जाएंगे। आइए जानते हैं कि इन आंदोलनों के बारे में और हमारी युवा पीढ़ी क्यों यह कदम उठाने पर विवश हुई? 

40 लाख साल में शीर्ष पर CO2

कुछ सौ साल पहले हमारी धरती ऐसी नहीं थी। शुद्ध हवा, पानी, मिट्टी और पर्यावरण मौजूद थे। हमने लोभ और मुनाफा कमाने के चक्कर में इसके संसाधनों का अतिदोहन शुरू किया जिससे धरती की सेहत गड़बड़ाती गई। अब ये बीमार पृथ्वी हमें स्थ रखने में अक्षम साबित हो रही है। औद्योगिक क्रांति के बाद से ही वायुमंडल में कार्बन डाईऑक्साइड (CO2) की मात्रा बढ़नी शुरू हुई। आज यह 40 लाख साल में अपने शीर्ष पर है। इसके बढ़ने की दर पिछले 6.6 करोड़ साल में सर्वाधिक है। हर साल अरबों टन कार्बन डाईऑक्साइड कोयले, ईंधन और गैस के जलने से वायुमंडल में पहुंचती है।

तापमान में वृद्धि, गड़बड़ाया मौसम चक्र 

दुनिया की विशाल आबादी के भेट भरने और रहने जैसी तमाम जरूरतों को पूरी करने के लिए दुनिया भर में पेड़ों की अंधाधुंध कटाई जारी है। यही पेड़ कार्बन डाईऑक्साइड को अवशोषित करके ऑक्सीजन मुक्‍त करते हैं। दो सदी पहले ग्रह का तापमान बढ़ना शुरू हुआ लेकिन दूसरे विश्व युद्ध के बाद खपत और आबादी के बढ़ने से इसमें अप्रत्याशित वृद्धि दिखी। तापमान बढ़ने से धरती का मौसम चक्र गड़बड़ाया। लिहाजा मौसम की अति दशाओं का प्रवृत्ति और आवृत्ति में बदलाव आया। 

हर पांच में से एक व्यक्ति के शहर के डूबने का खतरा

दो सदी पहले ग्रह का तापमान बढ़ना शुरू हुआ लेकिन दूसरे विश्व युद्ध के बाद खपत और आबादी के बढ़ने से इसमें अप्रत्याशित वृद्धि दिखी। तापमान बढ़ने से धरती का मौसम चक्र गड़बड़ाया। लिहाजा मौसम की अति दशाओं का प्रवृत्ति और आवृत्ति में बदलाव आया। धरती पर मौजूद बर्फ के पिघलने से समुद्र का तल तेजी से बढ़ रहा है। दुनिया के हर पांच में से एक व्यक्ति के शहर के डूबने का खतरा बढ़ा है। 2002 से ग्रीनलैंड की चार लाख करोड़ टन बर्फ पिघल चुकी है। हिमालय से लेकर एंडीज और एल्प्स तक तेजी से बर्फ खो रहे हैं जिससे उनके ग्लेशियर सिकुड़ते जा रहे हैं। हिमालय और हिंदूकुश की एक तिहाई बर्फ पिघल चुकी है।

मैदानों में बदल गईं पौधों की प्रजातियां 

गर्मी से समुद्र की बर्फ पिघल रही है। यह पानी सूरज की ज्यादा गर्मी को अवशोषित करता है जिससे गर्मी में और इजाफा होता है। मौसम विशेषज्ञों का मानना है कि आर्कटिक की बर्फ में आए इस बदलाव से लू और बाढ़ का प्रकोप यूरेशिया व उत्तरी अमेरिकी देशों में बढ़ेगा। अमेरिका की मिशिगन यूनिवर्सिटी के शोधकर्ताओं के अध्ययन के मुताबिक, दुनियाभर में 105 घास के मैदानों में जलवायु परिवर्तन की वजह से पैधों की प्रजातियों में बदलाव हुआ है। ‘प्रोसीडिंग्स ऑफ द नेशनल एकेडमी ऑफ साइंसेज’ जर्नल में प्रकाशित अध्ययन के अनुसार जलवायु परिवर्तन का असर इतना व्यापक पड़ा कि कुछ घास के मैदानों में पौधों की सभी प्रजातियां बदल गई हैं।

ऐसे पूरी दुनिया में फैला आंदोलन 

साल 2018 की बात है। अगस्त महीने की 20 तारीख थी। उस दिन स्वीडन की 15 वर्षीय छात्रा ग्रेटा थुनबर्ग स्कूल नहीं गईं। वे सीधे अपने देश की संसद के सामने धरने पर बैठ गईं। जलवायु परिवर्तन के प्रति ठोस कदम न उठा पाने के लिए सरकार के प्रति यह उनका अनशन था। लगातार तीन सप्ताह तक वे ऐसा करती रहीं। लोगों का ध्यान खींचा और उनसे जुड़े। कारवां बढ़ता गया। सितंबर में उन्होंने हर शुक्रवार को हड़ताल का आह्वान किया। यह क्रम उन्होंने तब तक जारी रखा जब तक कि स्वीडिश सरकार ने जलवायु परिवर्तन के प्रति अपनी नीतियों में सुधार नहीं किया। इसी से प्रेरित होकर दुनिया भर के छात्र और लोग अपनी-अपनी संसदों के सामने यही दोहराने लगे। धीरे-धीरे यह आंदोलन पूरी दुनिया में फैल गया। 

Posted By: Krishna Bihari Singh

अब खबरों के साथ पायें जॉब अलर्ट, जोक्स, शायरी, रेडियो और अन्य सर्विस, डाउनलोड करें जागरण एप