आंखों की रोशनी नहीं, हुनर की चमक से पुराने रेडियो में भरते हैं जान; अशोक गंगाधर भोये के हुनर की कहानी
बचपन में ही अपनी आंखों की रोशनी पूरी तरह खो चुके अशोक गंगाधर भोये ने हिम्मत नहीं हारी और दृष्टि ...और पढ़ें

बचपन में ही आंखों की रोशनी खो चुके अशोक गंगाधर भोये ने नहीं हारी हिम्मत (सांकेतिक तस्वीर)
HighLights
बचपन में ही आंखों की रोशनी खो चुके अशोक गंगाधर भोये ने नहीं हारी हिम्मत
बिना देखे करते हैं पुराने रेडियो, टेप रिकॉर्डर और इलेक्ट्रॉनिक सामान की मरम्मत
मिडडे, मुंबई। आज के दौर में जब रेडियो और टेप रिकॉर्डर घरों से लगभग गायब हो चुके हैं, महाराष्ट्र के वांगणी में दृष्टिबाधित शख्स इन पुरानी मशीनों को नवजीवन दे रहा है।
बचपन में ही अपनी आंखों की रोशनी पूरी तरह खो चुके अशोक गंगाधर भोये ने हिम्मत नहीं हारी और दृष्टि न होने के बावजूद अपने हुनर को तराशा। वह बिना देखे पुराने रेडियो, टेप रिकॉर्डर और दूसरे इलेक्ट्रानिक सामान की मरम्मत करते हैं।
तीन साल की उम्र में चेचक होने के कारण अशोक की आंखों की रोशनी चली गई। पूरी तरह से दृष्टिबाधित होने के बावजूद उन्होंने अपनी पढ़ाई जारी रखी और जलगांव जिले के चालिसगांव स्थित राष्ट्रीय विद्यालय से 10वीं कक्षा तक पढ़ाई की।
बाद में उन्होंने मालेगांव के अंबेडकर कालेज में दाखिला लिया, लेकिन उन्हें अपनी पढ़ाई बीच में ही छोड़नी पड़ी क्योंकि उन्हें परीक्षा के दौरान लिखने के लिए सहयोगी नहीं मिल सका।
इसके बाद रोजगार की तलाश में अशोक ने केले बेचे, आटा चक्की और जनरल स्टोर चलाया। बाद में वह इलेक्ट्रानिक सामान की मरम्मत की दुकानों पर काम करने लगे, जहां लोग अक्सर सवाल करते थे कि बिना दृष्टि वह बिजली के उपकरण कैसे ठीक कर सकेंगे।
पुराने दिनों को याद करते हुए अशोक ने कहा, मैं उनसे कहता था कि चिंता न करें और दो दिन बाद वापस आएं। मैं उनके उपकरण को ठीक करने की पूरी कोशिश करता था।2007 में बेहतर जिंदगी की उम्मीद में अशोक वांगणी शहर में आ गए।
स्थानीय निवासी अंकुश पाटणोरे ने उन्हें बिना किराये के रहने की जगह दी। शुरुआत में उन्होंने खिलौने बेचकर और मसाज व एक्यूपंक्चर का काम करके कमाई की।
उन्होंने पुराने रेडियो और टेप रिकॉर्डर ठीक करने के बचपन के शौक को फिर से अपना लिया। उनके बिजनेस की शुरुआत कुछ अलग तरह से हुई। मुंबई के एक व्यक्ति ने उन्हें लकड़ी का पुराना रेडियो दिया। कबाड़ी उसे सिर्फ ₹50 में लेना चाहता था।
भोये ने ₹150 में रेडियो खरीदा, उसे ठीक किया और बाद में ₹1,600 में बेच दिया। अब उन्हें अलग-अलग जगहों से फोन आते हैं। अशोक कई बार अकेले सफर करके पुराने रेडियो और इलेक्ट्रॉनिक सामान लेने पहुंच जाते हैं।
वह यूट्यूब से भी सीखते रहते हैं। इसमें उनकी बेटी और गुजरात का एक व्यक्ति मदद करते हैं, जो उन्हें ऑनलाइन वीडियो के जरिए प्रशिक्षण देता है। उनकी पहचान इतनी बढ़ गई है कि वांगणी में आटो चालक भी उन्हें रेडियो रिपेयर वाले के नाम से पहचान लेते हैं।
