प्रयागराज, हरिशंकर मिश्र। मेला में श्रद्धालुओं के आने से पहले ही डेरा डाल चुके प्रवासी पक्षी मानों अपने साथ अतीत की कहानियां भी लाते हैं। संगम तट पर अपने दादा के साथ पहली बार कुंभ क्षेत्र में आई नौ साल की गुड़िया इन पक्षियों का हुजूम देख हैरान है। उनके उड़ते ही उसकी अचरज भरी आंखें आसमान की ओर उठती चली जाती हैं। जौनपुर से कल्पवास को आये उसके दादा राम अधार को पोती की जिज्ञासा समझते देर नहीं लगती। वे बताते हैं- ये पक्षी साइबेरिया से आते हैं, कुंभ के बाद चले जाएंगे।

अकेले गुडिय़ा ही नहीं, प्रवासी पक्षी सभी के आकर्षण का केंद्र हैं। वे दशकों से कुंभ का हिस्सा हैं। पुण्य की डुबकी लोगों को आह्लादित करती है तो इनकी परवाज लोगों में ऊर्जा का संचार करती है। यही कुंभ है। सिर्फ संस्कृतियों का मिलन ही नहीं, यहां के हर पक्ष में संदेश छुपा है। पक्षियों को दाना खिलाने का संदेश साफ है, पशु-पक्षियों के प्रति प्रेम के लिए उन्हें किसी पेटा की जरूरत नहीं। गाय के पूजने मात्र से अभीष्ट पूरा होने की कामना में यह निहित है।

कुंभ की रातें कल्पवासियों के तंबुओं में गुलजार होती हैं। बड़े जतन से ट्रैक्टर से लाए गए पुआल किसी भी गद्दे को मात करते हैं तो ओढ़ी गई कथरी के भीतर अतीत के किस्सों की गरमाहट है। सेक्टर छह में आजमगढ़ से आये रिटायर्ड पुलिसकर्मी ओम प्रकाश पांडेय का परिवार रात में जब बैठा तो पिछले कुंभ के किस्से उभरने लगे। वह काली रात भी इन किस्सों में शामिल हुई जिसने पूरे मेले को तबाह कर दिया था। लेकिन अब उसकी गाथा रोमांचित करती है। बगल के टेंट से कुछ लोग और आ जाते हैं। वे पहली बार कल्पवास में आए थे और उनके लिए सब कुछ कौतूहल भरा था। वे अचरज से कल्पवासियों की साहस गाथा सुनते रहे कि कैसे दो दिन के भीतर ही मेला फिर उठ खड़ा हुआ। कैसे एक-दूसरे की विपदा सामूहिक प्रयासों में बदल गई। यह पूरी दुनिया के लिए आश्चर्य था।

ओम प्रकाश बताते हैं कि एक भी कल्पवासी मेला छोड़कर लौटने को तैयार न हुआ। गंगापार के 80 साल के राम दशरथ और पुराने किस्सों को ले आए और कहानियां नेहरू के दौर में मची भगदड़ तक पहुंच गई। रात धीरे-धीरे गहराती रही और किस्से गरमाते रहे। कल्पवासियों के लिए नागा साक्षात दैव अवतार हैं। अखाड़ों के बगल से गुजरते हुए उनके सिर स्वत: ही श्रद्धा में झुक जाते हैं। पहले के नागा श्रद्धालुओं को झिड़की देते थे, लेकिन अब उनके स्वभाव में भी परिवर्तन आया है। कई तो लोगों को अपने पास भी आने देते हैं और उनके हाथ से निकली भभूत भी लोगों के लिए प्रसाद है। यहां पहुंचे लोगों को अब मेले के पूर्ण होने की प्रतीक्षा है कि कब पहला स्नान आएगा और वे शाही स्नान का दृश्य देख कृतार्थ होंगे।

अपने बाबा को कल्पवास के लिए पहुंचाने आया एक युवक दिलीप बताता है कि वह तो सिर्फ नागाओं का स्नान देखने ही आया है। लोगों के बीच नागाओं की भी कहानियां हैं कि वे हिमालय से यहां प्रकट होते हैं। कहां चले जाते हैं, कोई नहीं जानता। यह रहस्य ही उन्हें लोगों के बीच दैवत्व प्रदान किए हुए है।

 

Posted By: Ravindra Pratap Sing