भारतीय जॉब मार्केट में डिग्री और स्किल का बढ़ता महत्व: युवाओं के लिए नई राह
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने डिग्री के साथ स्किल के महत्व पर जोर दिया है, क्योंकि भारतीय जॉब मार्केट तेजी से ...और पढ़ें

स्किल आधारित नौकरियों से आगे बढ़ेंगे युवा।
HighLights
PM मोदी ने डिग्री के साथ स्किल को बताया नौकरी की कुंजी।
भारतीय जॉब मार्केट में अब सिर्फ डिग्री पर्याप्त नहीं, स्किल जरूरी।
भारत में औपचारिक कौशल प्रशिक्षण विकसित देशों से काफी कम है।
जेएनएन, नई दिल्ली। एक समय था जब नौकरी पाने के लिए केवल डिग्री ही काफी होती थी, लेकिन अब ऐसा नहीं है। दुनिया बहुत तेजी से बदल रही है। हर दो-तीन साल में तकनीक पुरानी हो जाती है या उसे अपग्रेड करना पड़ता है। हाल ही में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने एक वीडियो संदेश में इसी बात को रेखांकित किया है।
उन्होंने देश के युवाओं से कहा कि पहले ध्यान सिर्फ डिग्री पर था, लेकिन आज स्किल भी उतना ही जरूरी है। उन्होंने इस बात पर भी जोर दिया कि कालेज की पढ़ाई खत्म होने पर शिक्षा पूरी नहीं माननी चाहिए, आपको समय-समय पर खुद को अपग्रेड करते रहना चाहिए। ऐसे में दुनिया के जाब मार्केट में डिग्री के साथ स्किल की जरूरत और युवाओं की मौजूदा स्थिति की पड़ताल प्रासंगिक है...
भारतीय जॉब मार्केट की बदलती तस्वीर
भारतीय जॉब मार्केट में अब सिर्फ स्नातक या स्नातकोत्तर की डिग्री होना नौकरी की गारंटी नहीं है। आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआई), आटोमेशन और डिजिटल क्रांति के कारण कंपनियां शैक्षणिक डिग्री से ज्यादा प्रैक्टिकल स्किल और समस्याओं के समाधान की योग्यता को प्राथमिकता दे रही हैं।
वर्तमान स्थिति
इंडिया स्किल्स रिपोर्ट 2026 और श्रम मंत्रालय के आंकड़ों के अनुसार, भारत में युवाओं की रोजगार योग्यता में धीरे-धीरे सुधार हुआ है, लेकिन डिग्री और स्किल के बीच का अंतर अभी भी एक चुनौती बना हुआ है।

औपचारिक कौशल प्रशिक्षण: भारत बनाम विकसित देश
दक्षिण कोरिया, 96 प्रतिशत
जापान, 80 प्रतिशत
जर्मनी,75 प्रतिशत
ब्रिटेन, 68 प्रतिशत
अमेरिका, 52 प्रतिशत
भारत, 5 प्रतिशत
आंकड़ों का स्रोत: नीति आयोग, विश्व बैंक
भारत बनाम विकसित देश: मुख्य अंतर
औपचारिक व्यावसायिक प्रशिक्षण: भारत में कार्यबल का केवल 5% हिस्सा ही औपचारिक रूप से कुशल या प्रशिक्षित है, जबकि दक्षिण कोरिया में यह आंकड़ा 96%, जापान में 80% और जर्मनी में 75% है।
शिक्षा और व्यावहारिक तैयारी: विकसित देशों में व्यावसायिक शिक्षा को हाई स्कूल के पाठ्यक्रम से ही जोड़ दिया जाता है। इसके विपरीत, भारत में उच्च शिक्षा मुख्य रूप से सैद्धांतिक है, जिससे स्नातकों की रोजगार क्षमता लगभग 56% पर ही सीमित रह जाती है।
अप्रेंटिसशिप का दायरा: जर्मनी का डुअल वीईटी सिस्टम 50% से अधिक हाई स्कूल स्नातकों को क्लासरूम की पढ़ाई के साथ-साथ कंपनियों में पेड अप्रेंटिसशिप की सुविधा देता है। भारत में सक्रिय अप्रेंटिस कुल कार्यबल का 0.5% से भी कम हैं।
स्किल-जाब का बेमेल होना: अंतरराष्ट्रीय सर्वेक्षणों के अनुसार, भारत में लगभग 65%–70% नियोक्ता सही तकनीकी और साफ्ट स्किल्स वाले उम्मीदवार न मिलने की शिकायत करते हैं, जबकि विकसित देश निरंतर कारपोरेट अपस्किलिंग प्रोग्राम चलाकर इसे हल करते हैं।
इस अंतर के मुख्य कारण
सामाजिक दृष्टिकोण: भारत में वोकेशनल ट्रेनिंग जैसे आइटीआआई या डिप्लोमा को अक्सर अंतिम विकल्प के रूप में देखा जाता है, जबकि पारंपरिक डिग्रियों बीए, बीकाम, बीटेक को सामाजिक प्राथमिकता मिलती है।
पाठ्यक्रम का पुराना होना: भारतीय कालेजों और अकादमिक संस्थानों का पाठ्यक्रम एआइ, आटोमेशन और नई तकनीकों की तेज़ गति से तालमेल नहीं बिठा पाता।
असंगठित क्षेत्र का प्रभुत्व: भारत में 85 प्रतिशत से अधिक रोजगार असंगठित क्षेत्र में है, जहां कौशल काम के दौरान सीखा जाता है लेकिन उसका कोई मानक प्रमाणन नहीं होता।
रिसर्च- महेंद्र प्रताप सिंह
यह भी पढ़ें: स्किलिंग का नया मंत्र: डिजिटल पासपोर्ट, स्किल एक्सचेंज और स्किल स्कोर पर काम करेगी सरकार
