जागरण ब्यूरो, नई दिल्ली। लोगों के निजी डाटा की सुरक्षा के लिए प्रस्तावित डाटा प्रोटेक्शन कानून के निर्बाध अमल के लिए सरकार को आधार समेत कई अन्य कानून व नियमों में बदलाव करना होगा। डाटा प्रोटेक्शन कानून का खाका देने वाली जस्टिस बीएन श्रीकृष्णा समिति ने ऐसे करीब 50 नियमों की पहचान की है जिनका दोहराव प्रस्तावित नए कानून की विभिन्न धाराओं से होगा। समिति का मानना है कि इन बदलावों के बाद ही डाटा प्रोटेक्शन कानून पर पूर्ण अमल संभव हो सकेगा।

समिति ने डाटा प्रोटेक्शन पर सरकार को सौंपी अपनी रिपोर्ट में आधार कानून में दो संशोधन सुझाए हैं। पहला लोगों के निजता के अधिकार को और संबल देगा। इसके तहत लोगों के डाटा की प्रोसेसिंग की प्रक्रिया को जरूरत के आधार पर दो वर्गो में बांटने का सुझाव दिया गया है। एक, ऑथेंटिकेशन के अनुरोध से संबंधित और दूसरा, ऑफलाइन रहते हुए किसी व्यक्ति की पहचान के मूल्यांकन के लिए।

इसके अतिरिक्त समिति ने दूसरा संशोधन आधार की मूल संस्था यूआइडीएआइ की स्वायत्तता सुनिश्चित करने के संबंध में सुझाया है। देश में अब तक 121 करोड़ लोगों को आधार नंबर जारी किया जा चुका है। केंद्र व राज्य सरकारें की तरह के लाभ देने के लिए आधार नंबर के जरिए लाभार्थियों की पहचान सुनिश्चित करती हैं।

आधार को पहचान की तरह इस्तेमाल करने के लिए एक रेगुलेटरी सिस्टम की आवश्यकता है। इसके लिए दो बदलाव करने होंगे। पहला यूआइडीएआइ को संचालन के लिए निर्णय लेने में स्वायत्त बनाना होगा। दूसरे उसे ऐसे अधिकार प्रदान करने होंगे जो परंपरागत रूप से नियामकों को उपलब्ध हैं।

आधार के अतिरिक्त समिति ने कुछ अन्य कानूनों में भी संशोधन का सुझाव दिया है। आरटीआइ एक्ट के तहत लोगों के डाटा को सार्वजनिक करने वाले नियम को समिति ने और अधिक पारदर्शी बनाने का सुझाव दिया है। इसके अतिरिक्त डाटा प्रोटेक्शन कानून अमल में आने के बाद समिति ने आइटी एक्ट की धारा 43ए को भी हटाने का सुझाव दिया है।

श्रीकृष्ण समिति ने ऐसे 50 नियमों की पहचान भी की है जो प्रस्तावित डाटा प्रोटेक्शन नियम के अमल में आने के बाद गैर-जरूरी हो जाएंगे। समिति ने अपनी रिपोर्ट में कहा है कि जिन मंत्रालयों के अंतर्गत ये नियम आते हैं उन्हें पहले ही आवश्यक कदम उठाने होंगे।

Posted By: Bhupendra Singh

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