दाल-तिलहन में आत्मनिर्भरता पर फोकस, आईसीएआर को मिला 2047 का रोडमैप
केंद्रीय कृषि मंत्री शिवराज सिंह चौहान ने आईसीएआर के 98वें स्थापना दिवस पर कृषि अनुसंधान का असली पैमाना किसानों की समस्या समाधान को बताया।

HighLights
किसानों की समस्या समाधान ही कृषि अनुसंधान का असली पैमाना।
दाल-तिलहन में आत्मनिर्भरता, 100 क्लाइमेट स्मार्ट गांव विकसित करने का लक्ष्य।
2047 तक कृषि उत्पादन 2.1 अरब टन करने का रोडमैप।
जागरण ब्यूरो, नई दिल्ली। भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (आईसीएआर) के 98वें स्थापना दिवस पर केंद्रीय कृषि मंत्री शिवराज सिंह चौहान ने साफ कर दिया कि कृषि अनुसंधान का असली पैमाना शोधपत्र नहीं, बल्कि किसानों की समस्या का समाधान होगा। वैज्ञानिकों से कहा कि ऐसा शोध का कोई अर्थ नहीं जो खेत तक न पहुंचे।
विकसित भारत के लक्ष्य को सामने रखते हुए उन्होंने दाल-तिलहन में आत्मनिर्भरता, जलवायु परिवर्तन से मुकाबला और किसानों तक आधुनिक तकनीक पहुंचाने का बड़ा रोडमैप पेश करते हुए कहा कि उत्पादकता बढ़ाने का स्थायी उपाय खोजना होगा।
आईसीएआर के शताब्दी वर्ष से पहले देश में सौ क्लाइमेट स्मार्ट गांव विकसित करने का लक्ष्य रखा और अगले दो वर्षों को ''मिशन आईसीएआर-100'' के रूप में चलाने का सुझाव दिया।कार्यक्रम में आईसीएआर ने 43 नई फसल किस्में, 17 नई कृषि तकनीकें और 14 प्रकाशन जारी किए। इनमें रोगरोधी और पोषणयुक्त फसलें, पशुधन और मत्स्य क्षेत्र की नई वैक्सीन तथा डिजिटल कृषि समाधान शामिल हैं।
70 से अधिक तकनीकी लाइसेंस और समझौता ज्ञापनों पर भी हस्ताक्षर हुए ताकि नई तकनीकें किसानों तक पहुंच सकें। चौहान ने सबसे ज्यादा चिंता दाल और तिलहन की कम उत्पादकता को लेकर जताई। उन्होंने कहा कि भारत आज भी हर साल लगभग 60 से 70 लाख टन दाल और डेढ़ करोड़ टन से अधिक खाद्य तेल आयात करता है। उन्होंने वैज्ञानिकों से सवाल किया कि जब बिना जीएम बीज वाले कई देश भारत से अधिक दाल उत्पादन कर सकते हैं तो भारत ऐसा क्यों नहीं कर सकता।
उन्होंने बताया कि एक एकड़ में सौ क्विंटल से अधिक मक्का का उत्पादन लिया जा सकता है, जबकि धान से 30 से 35 क्विंटल और चना-मूंग का केवल पांच क्विंटल उत्पादन होता है। इस अंतर को कम करना वैज्ञानिकों की जिम्मेदारी है। कृषि मंत्री ने कहा कि अब केवल उत्पादन बढ़ाना पर्याप्त नहीं है।
कृषि उत्पादों की गुणवत्ता भी बेहतर करनी होगी ताकि भारतीय उपज वैश्विक बाजार में प्रतिस्पर्धा कर सके। उन्होंने अलनीनो जैसी चुनौतियों का उल्लेख करते हुए जलवायु-अनुकूल खेती, जोखिम प्रबंधन एवं जिलेवार कृषि योजना पर फोकस करने की जरूरत बताई।
चौहान ने कहा कि आईसीएआर का हर संस्थान अगले दो वर्षों में कम से कम एक ऐसा नवाचार विकसित करे जिसका राष्ट्रीय स्तर पर असर दिखाई दे। नई फसल किस्म, वैक्सीन, डिजिटल प्लेटफार्म या जलवायु-अनुकूल तकनीक हो सकती है। कृषि विज्ञान केंद्रों को केवल प्रशिक्षण केंद्र नहीं, बल्कि इनोवेशन हब और क्लाइमेट एडवाइजरी सेंटर के रूप में विकसित किया जाएगा।
आईसीएआर ओपन डिजिटल नालेज प्लेटफार्म बनाया जाएगा, जिससे 10 करोड़ किसानों तक मोबाइल के जरिए वैज्ञानिक सलाह, मौसम, मृदा परीक्षण और नई तकनीकों की जानकारी मुफ्त में पहुंचाई जाएगी।उन्होंने नकली बीज और घटिया कीटनाशकों को किसानों की बड़ी समस्या बताते हुए सख्त कानून बनाने की जरूरत बताई। साथ ही वैज्ञानिकों से ऐसी तकनीक विकसित करने का आग्रह किया जिससे खेत पर ही बीज और कीटनाशकों की गुणवत्ता की जांच हो सके।
आईसीएआर के महानिदेशक एमएल जाट ने बताया कि 2047 तक के रोडमैप में धान और गेहूं का रकबा सीमित कर मक्का, मोटे अनाज, दालों और बागवानी फसलों को बढ़ावा देने की योजना है। लक्ष्य है कि कुल कृषि उत्पादन 1.3 अरब टन से बढ़कर 2.1 अरब टन हो, जबकि दूध, बागवानी और मत्स्य उत्पादन में बड़ी वृद्धि हो।
