अजय शुक्ला, लखनऊ। कल्याण करने वाले शिव, माया के अधीश्वर महेश्वर, आनंद देने वाले शम्भू, चंद्रमा धारण करने वाले शशिशेखर, सर्प धारण करने वाले भुजंगभूषण और भूतों के नाथ भूतनाथ। यूं तो वेशभूषा और गुण- स्वरूप के आधार पर शिव के 108 नाम प्रचलित हैं, लेकिन भक्तों के भोले इतने भोले हैं कि उन्हें जिस भी नाम से पुकार लें, वह वही नाम धारण कर लेते हैं।

कुछ उदाहरण देखिए, बाबा का शिवाला जंगल में है तो जंगलीनाथ हो गए। उनके आगे किसी का घमंड नहीं चलता इसलिए घमंडीनाथ हो गए। झाड़ियों में शिवलिंग मिला तो झारखंडेश्वर हो गए और लिंग टेढ़ा हुआ तो टेढ़ेनाथ हो गए। यह तो सिर्फ बानगी है पांडवों की अज्ञातवास स्थली में जितने शिवाले, शिव के उतने ही नाम हैं।

दरअसल, हिमालय की तराई से लगते प्राचीन जंगलवर्ती क्षेत्रों में पांडवों ने अपने अज्ञातवास का समय व्यतीत किया था। अज्ञातवास के समय पांडवों ने यहां जिन शिवलिंगों की स्थापना की, समय के साथ वह लुप्त हो गए। बौद्ध, मुगल और ब्रिटिश काल में इन मंदिरों की उपेक्षा और भंजन के कारण तमाम प्राचीन मंदिरों का अस्तित्व मिट गया। लेकिन समय के साथ विभिन्न किंवदंतियों का रूप लेते यह शिवलिंग पुन: प्रकट हुए और विशाल शिवालों में परिवर्तित हो गए। जितने प्राचीन व भव्य शिवाले इस क्षेत्र में हैं, उतने दूसरे स्थानों पर नहीं मिलते।

अयोध्या, बाराबंकी, लखनऊ और लखीमपुर के गोला में तो शिव के अत्यंत प्राचीन मंदिर हैं ही लेकिन आसपास के कस्बों तक में विभिन्न रोचक नाम वाले महाभारतकालीन शिव मंदिर मौजूद हैं। देवराज इंद्र द्वारा स्थापित अनेक मंत्री सुनासिरनाथ नाम से मौजूद हैं। वेश-भूषा और आभूषण के रूप में भस्म, नाग, मृग चर्म, रुद्राक्ष और मुंडमाला धारण करने वाले शिव अकेले ऐसे देवता हैं जिन्हें सर्वहारा वर्ग का सबसे प्रिय देव कहा जा सकता है।

अजब गजब नाम

झारखंडेश्वरनाथ, कादीपुर (सुलतानपुर)
कस्बे में झाड़ियों के बीच शिवलिंग के स्थापित होने से भक्तों ने ही शंकरजी को झारखंडेश्वरनाथ नाम दिया।

भूतेश्वरनाथ मंदिर, नैमिषारण्य (सीतापुर)
नैमिषारण्य के पौराणिक चक्रतीर्थ के तट पर स्थित भूतेश्वरनाथ मंदिर के बारे में कहा जाता है कि भूतेश्वरनाथ के आदेश से यह आसुरी शक्तियां धर्मकार्य में बाधा नहीं डालती हैं। इसी कारण भगवान भूतेश्वरनाथ को नैमिषारण्य की परिधि में वास कर रहे 33 कोटि देवी-देवताओं, 3.5 करोड़ तीर्थों, 88 हजार ऋषियों-मुनियों के रक्षक के रूप में कोतवाल भी कहा जाता है।

सैनिकेश्वर महादेव (बाराबंकी)
सैनिकेश्वर मंदिर नगर के पूर्व सैनिक कल्याण एवं पुनर्वास कार्यालय के परिसर में स्थित है, सेवानिवृत्त सैनिकों ने इसका निर्माण कराया और शिवलिंग की स्थापना कर सैनिकेश्वर का नाम दिया।

गल्थरेश्वर, डीह (रायबरेली)
टीले पर खोदाई के दौरान एक शिवलिंग मिला जो पेड़ के गलथे में फंसा था। ऐसे में इसे गल्थरेश्वर मंदिर कहा जाने लगा।

बाबा घमंडीनाथ शिव मंदिर, नवाबगंज (गोंडा)
लोकमान्यता है कि आसपास के जितने भी देवी देवता हैं इनके आगे किसी का घमंड नहीं चला।

बाबा जंगलीनाथ, राजापुर (बलरामपुर)
सदियों पहले कुछ चरवाहों ने जंगल में शिवलिंग निकलने की बात राज परिवार को बताई थी। रानी ने मंदिर का जीर्णोद्धार कराया।

पृथ्वीनाथ मंदिर, खरगूपुर (गोंडा)
महाभारत काल में अज्ञातवास के दौरान भीम ने शिवलिंग की स्थापना की थी। यहां का शिवलिंग साढ़े पांच फीट ऊंचा है। पृथ्वी से प्रकट होने के कारण इसका नाम पृथ्वीनाथ मंदिर पड़ गया।

बालेश्वरनाथ, वजीरगंज (गोंडा)
मु्गल सम्राट औरंगजेब की सेना यहां पर ठहरी थी। खाना बनाने के लिए लकड़ी की आवश्यकता होने पर बेल के पेड़ को काटते समय शिवलिंग निकला। ऐसे में लोगों ने यहां मंदिर का निर्माण कर इसका नाम बालेश्वरनाथ रख दिया।

मुंडा शिवाला, भिनगा (श्रावस्ती)
पूर्व भिनगा स्टेट के कर्मचारी बेनी सिंह ने मंदिर का निर्माण शुरू करवाया। ऊपरी हिस्से का निर्माण पूरा होने से पहले ही उनकी मौत हो गई। तब से यह शिवाला अधूरा है।

Posted By: Sanjay Pokhriyal