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महाराष्ट्र की सियासत का महासमर: सुप्रीम कोर्ट में शिवसेना के वर्चस्व की जंग पर फिर गरमाई बहस

Published: Tue, 15 Sep 2026 10:15 PM (IST)

सुप्रीम कोर्ट में शिवसेना के विभाजन और असली हकदार की पहचान को लेकर सुनवाई एक बार फिर तेज हो गई ...और पढ़ें

सुप्रीम कोर्ट में शिवसेना के वर्चस्व की जंग पर फिर गरमाई बहस।

सुप्रीम कोर्ट में शिवसेना के वर्चस्व की जंग पर फिर गरमाई बहस।

HighLights

  1. सुप्रीम कोर्ट में शिवसेना के विभाजन पर सुनवाई फिर तेज हुई।

  2. शिंदे गुट ने चुनाव आयोग के फैसले को पूरी तरह जायज ठहराया।

  3. सांगठनिक बहुमत और संविधान की कसौटी पर दलीलें पेश की गईं।

डिजिटल डेस्क, नई दिल्ली। शिवसेना के विभाजन और असली हकदार की पहचान को लेकर सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई एक बार फिर तेज हो गई है। मंगलवार को सीजेआई सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ के सामने एकनाथ शिंदे गुट ने चुनाव आयोग के फैसले को पूरी तरह जायज ठहराया।

कोर्ट ने उन याचिकाओं पर अंतिम सुनवाई फिर से शुरू की, जिनमें महाराष्ट्र विधानसभा अध्यक्ष के उस फैसले को चुनौती दी गई है जिसके तहत उन्होंने शिंदे गुट के विधायकों को अयोग्य नहीं ठहराया था। इस दौरान इस गुट ने चुनाव आयोग के उस फैसले का बचाव किया जिसमें उसे असली शिवसेना के तौर पर मान्यता दी गई थी।

सांगठनिक बहुमत और संविधान की कसौटी पर शिंदे गुट का तर्क

सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई के दौरान एकनाथ शिंदे गुट की ओर से वरिष्ठ वकील नीरज किशन कौल ने दलील दी कि चुनाव आयोग को संविधान के अनुच्छेद 324 के तहत राजनीतिक दल के आंतरिक लोकतांत्रिक स्वरूप और सांगठनिक ढांचे की जांच करने का पूरा अधिकार है।

उन्होंने स्पष्ट किया कि आयोग ने किसी दीवानी अदालत की तरह आंतरिक चुनावों के विवादों को नहीं सुलझाया, बल्कि यह परखा कि क्या पार्टी का ढांचा वास्तव में उसके कार्यकर्ताओं और कैडर की इच्छा का प्रतिनिधित्व करता है।

कौल ने कोर्ट को बताया कि यदि पार्टी में सिर्फ तदर्थ (एडहॉक) और बिना चुनाव वाले पद भरे जाएं, तो संगठन का मूल स्वरूप अपनी सार्थकता खो देता है। इसके साथ ही, उन्होंने यह भी रेखांकित किया कि ठाकरे गुट द्वारा जिस संविधान का हवाला दिया गया, वह चुनाव आयोग में विधिवत पंजीकृत नहीं था, जबकि 1999 में जमा किया गया संविधान पूरी प्रक्रिया के तहत था।

विचारधारा के टकराव और कैडर की नाराजगी पर भी चर्चा

सुनवाई के दौरान यह भी बात सामने आई कि कैसे वैचारिक रूप से विरोधी दलों के साथ गठबंधन करने पर शिवसेना के जमीनी कार्यकर्ताओं और कैडर में गहरी नाराजगी थी। शिंदे गुट का पक्ष रखते हुए कहा गया कि यह मामला सिर्फ विधायी दल (विधायकों) के टूटने का नहीं, बल्कि सीधे तौर पर एक राजनीतिक दल के भीतर की फूट का है।

चूंकि पार्टी के हर एक प्राथमिक सदस्य का जनमत संग्रह कराना संभव नहीं है, इसलिए चुनाव आयोग द्वारा अपनाया गया 'सांगठनिक बहुमत परीक्षण' इस विवाद को सुलझाने का सबसे प्रभावी और तार्किक जरिया था। कौल ने जोर देकर कहा कि किसी भी राजनीतिक दल की असली जीवन रेखा उसके जमीनी कार्यकर्ता होते हैं, जो सीधे जनता से जुड़े होते हैं।

बहरहाल, इस संवेदनशील और बहुचर्चित मामले की सुनवाई बुधवार को भी जारी रहेगी, जिस पर पूरे देश की निगाहें टिकी हैं।

(समाचार एजेंसी पीटीआई के इनपुट के साथ)