नई दिल्‍ली (ऑनलाइन डेस्‍क)। अमृतसर के जलियांवाला बाग में 13 अप्रैल 1919 को जो कुछ हुआ था उसने पूरे देश को झकझोड़ कर रख दिया था। इस नरसंहार का जिम्‍मेदार ब्रिगेडियर जनरल माइकल ओ डायर था। आयरलैंड में जन्‍मा डायर अपने मां-बाप की छठी औलाद थी। उसकी पढ़ाई आयरलैंड और फिर लंदन से हुई थी। 1882 में उसने इंडियन सिविल सर्विस का एंट्रेंस एग्‍जाम पास किया और फिर दो साल के बाद इसका मेन एग्‍जाम भी उसने पास कर लिया था।

1885 में वो पहली बार भारत आया था और उसको पंजाब के शाहपुर में पोस्टिंग मिली थी। 1896 में उसको प्रमोट कर डायरेक्‍टर लैंड रिकॉर्ड बना दिया गया। इसके अलावा उसको अलवर और भररपुर स्‍टेट का भी इंचार्ज बनाया गया था। 1901 से 1908 तक वो रिवेन्‍यू कमिश्‍नर और 1908-1909 तक वो हैदराबाद का एक्टिंग रेजीडेंट रहा। इसके बाद 1910-1912 तक वो सेंट्रल इंडिया का गवर्नर जनरल का एजेंट नियुक्‍त किया गया। 1912 में लार्ड हॉर्डिंग ने उसको पंजाब का लेफ्टिनेंट गवर्नर नियुक्‍त किया। 13 अप्रैल 1919 को उसने जलियांवाला बाग में निहत्‍थे लोगों पर गोलियां चलाने का आदेश दिया था। उस वक्‍त जलियांवाला बाग में उसकी इस करतूत का एक चश्‍मदीद था, जिसका नाम था सरदार उधम सिंह। उधम सिंह ने अपनी आंखों के सामने लोगों को मरते हुए देखा था, जिसके बाद उसने हत्‍यारे डायर को इसकी सजा देने की प्रतिज्ञा ली थी।

पंजाब के संगरूर जिले के गांव सुनाम में 26 दिसम्बर 1899 को पैदा हुए उधम सिंह जलियांवाला बाग हत्‍याकांड के वक्‍त करीब 20 वर्ष के थे। जनरल डायर को जान से मारने के लिए उन्‍हें कई वर्षों का इंतजार करना पड़ा था। वो अपने परिवार में अकेले थे। उनके माता-पिता और भाई पहले ही दुनिया से जा चुके थे। ऐसे में उनके जीवन का केवल एक ही मकसद था, जनरल डायर की मौत। इसके लिए वो नाम बदल-बदल कर पहले दक्षिण अफ्रीका, नैरोबी, ब्राजील और अमेरिका में रहे। वर्ष 1934 में वो अपने मकसद को पूरा करने के लिए लंदन पहुंचे और वहां पर उन्‍होंने एक कार और रिवॉल्‍वर खरीदी।

वो लगातार उस मौके की तलाश में थे जब उन्‍हें डायर को मारने का सही मौका मिले। छह वर्षों के बाद उन्‍हें ये मौका उस वक्‍त मिला जब जलियांवाला बाग हत्याकांड के 21 साल बाद 13 मार्च 1940 को रायल सेंट्रल एशियन सोसायटी की लंदन के काक्सटन हाल में बैठक आयोजित की गई। इस बैठक में इस नरसंहार का हत्‍यारा डायर वक्ता के तौर पर मौजूद था। बस उनके लिए यही सही मौका था। वो एक किताब में अपनी रिवॉल्‍वर को छिपाकर बैठक में शामिल हुए और डायर को सामने से अपनी गोलियों का निशाना बनाया। डायर ने वहीं पर दम तोड़ दिया था।

इस घटना से पूरे हॉल में खलबली मच गई थी और लोग इधर-उधर भाग रहे थे। लेकिन उधम सिंह के चेहरे पर मुस्‍कान थी। वो 21 वर्ष के बाद उस मकसद को पाने में कामयाब हो गए थे जिसकी उन्‍होंने प्रतिज्ञा ली थी। जनरल डायर को उसके किए की सजा दी जा चुकी थी। वो वहां से भागे नहीं, जिसकी वजह से उन्‍हें गिरफ्तार कर लिया गया। उनके ऊपर डायर की हत्‍या का मुकदमा चलाया गया और इसमें उन्‍हें दोषी ठहराते हुए सजा-ए-मौत दी गई। 31 जुलाई को सरदार उधम सिंह ने हंसते-हंसते फांसी का फंदा चूमा था।

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