विज्ञापन हटाएंसिर्फ खबर पढ़ें

एससी-एसटी एक्ट में अग्रिम जमानत पर रोक जारी रहेगी, सुप्रीम कोर्ट बोला- रिव्यू जरूरी नहीं

Published: Tue, 22 Sep 2026 10:53 PM (IST)

सुप्रीम कोर्ट ने एससी-एसटी एक्ट 2018 संशोधन की संवैधानिक वैधता को चुनौती देने वाली याचिका खारिज कर दी, जिसमें अग्रिम जमानत पर रोक बहाल की गई थी।

सुप्रीम कोर्ट ने एससी-एसटी एक्ट संशोधन की याचिका खारिज की

सुप्रीम कोर्ट ने एससी-एसटी एक्ट संशोधन की याचिका खारिज की

HighLights

  1. सुप्रीम कोर्ट ने एससी-एसटी एक्ट संशोधन की याचिका खारिज की।

  2. अग्रिम जमानत पर रोक जारी रहेगी, 2020 के फैसले को बरकरार रखा।

  3. अदालत ने दुरुपयोग रोकने के लिए पर्याप्त सुरक्षा उपायों का जिक्र किया।

डिजिटल डेस्क नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम में 2018 के संशोधन की संवैधानिक वैधता को चुनौती देने वाली एक जनहित याचिका पर सुनवाई करने से इन्कार कर दिया। इस संशोधन के जरिये अग्रिम जमानत पर लगी रोक को बहाल कर दी गई थी। संशोधित कानून में एफआइआर दर्ज करने से पहले प्रारंभिक जांच और गिरफ्तारी से पहले पूर्व स्वीकृति की आवश्यकता को भी हटा दिया था।

प्रधान न्यायाधीश सूर्यकांत, जस्टिस जोयमाल्या बागची और जस्टिस वी. मोहना की पीठ ने बृजभूषण सैनी द्वारा दायर याचिका खारिज कर दी और कहा कि संशोधित प्रविधानों को शीर्ष अदालत 2020 में ही सही ठहरा चुकी है। पीठ ने सैनी की ओर से पेश वकील विष्णु शंकर जैन की उस दलील को भी खारिज कर दिया जिसमें 2020 के फैसले पर पुनर्विचार करने को कहा गया था। अदालत ने कहा कि प्रविधानों के संभावित दुरुपयोग के विरुद्ध पर्याप्त सुरक्षा उपाय पहले ही निर्धारित किए जा चुके हैं।

जैन ने कहा कि एससी-एसटी एक्ट के तहत अग्रिम जमानत पर कानूनी रोक 'विपरीत भेदभाव' है और इन प्रविधानों का दुरुपयोग हो सकता है। उन्होंने इस एक्ट के तहत दर्ज मामलों में सजा की कम दर का भी जिक्र किया और कानूनी योजना के तहत मुआवजा बांटने के तरीके पर सवाल उठाए।

एक राज्यसभा सदस्य के भाषण का हवाला देते हुए उन्होंने आरोप लगाया कि मुआवजे के तौर पर 493 करोड़ रुपये बांटे गए थे और यह व्यवस्था एफआइआर दर्ज करने को बढ़ावा दे सकती है। उन्होंने कहा कि संसद 2018 के संशोधन के जरिये उन प्रविधानों पर मुहर नहीं लगा सकती जिन्हें पहले सुप्रीम कोर्ट ने कमजोर कर दिया था, वह भी बिना कोर्ट के फैसले में बताई गई कमियों को दूर किए।

शीर्ष अदालत ने 2018 के फैसले में निर्देश दिया था कि एससी-एसटी एक्ट के तहत कुछ परिस्थितियों में एफआइआर दर्ज करने से पहले प्रारंभिक जांच की जाए और सरकारी कर्मचारी की गिरफ्तारी से पहले नियुक्ति करने वाले अधिकारी की मंजूरी ली जाए। अदालत ने कहा था कि उचित मामलों में अग्रिम जमानत दी जा सकती है जहां पहली नजर में कोई मामला नहीं बनता हो। फैसले के बाद संसद ने कानून में संशोधन कर धारा 18ए जोड़ी थी।

न्यूज एजेंसी PTI से मिली जानकारी के मुताबिक