नई दिल्ली, जागरण ब्यूरो। प्रधान न्यायाधीश के खिलाफ महाभियोग की चर्चा को दुर्भाग्यपूर्ण और परेशान करने वाली बताते हुए शुक्रवार को सुप्रीम कोर्ट ने इस पर रोक लगाने की मांग पर अटार्नी जनरल से सुनवाई में मदद करने को कहा है। न्यायमूर्ति एके सीकरी व न्यायमूर्ति अशोक भूषण की पीठ ने ये टिप्पणी ऐसी चर्चा पर रोक लगाने की मांग वाली जनहित याचिका पर सुनवाई के दौरान की। गैर सरकारी संगठन इन परसुएट आफ जस्टिस की ओर से जनहित याचिका दाखिल कर जज को पद से हटाने की संसद में शुरू होने वाली महाभियोग की औपचारिक प्रक्रिया से पहले खुले तौर पर चर्चा होने पर ऐतराज जताया गया है।

याचिका में सांसदों और मीडिया को ऐसी चर्चा से रोकने की मांग की गई है। साथ ही कहा गया है कि संविधान के अनुच्छेद 124(4) (सुप्रीम कोर्ट जज को पद से हटाने की प्रक्रिया) और अनुच्छेद 217(1)(बी) (हाईकोर्ट जज को पद से हटाने की प्रक्रिया) के तहत संसद में औपचारिक प्रक्रिया शुरू होने से पहले की प्रक्रिया के लिए दिशा निर्देश और नियम कायदे तय किये जाएं। शुक्रवार को याचिका पर सुनवाई के दौरान वरिष्ठ वकील मिनाक्षी अरोड़ा ने कहा कि अगर इस तरह की चर्चा चलेगी तो कोई जज कैसे निर्भीक और बिना दबाव के काम कर सकता है। उन्होंने कहा कि संविधान का अनुच्छेद 121 तो सांसदों के संसद में भी एक निश्चित सीमा तक जजों के आचरण पर चर्चा करने पर रोक लगाता है तो फिर सांसद इस तरह जब चाहें इस पर कैसे चर्चा कर सकते हैं।

अरोड़ा ने कहा कि इस तरह की चर्चा से न्यायपालिका की स्वतंत्रता बाधित होती है। सुनवाई कर रही पीठ ने उनकी दलीलों से सहमति जताई लेकिन कहा कि कोर्ट को इस बारे में रोक आदेश जारी करने से पहले मामले पर सुनवाई और विचार करना होगा। पीठ ने अटार्नी जनरल केके वेणुगोपाल से इस मामले की सुनवाई में कोर्ट की मदद करने का अनुरोध किया है। कोर्ट ने मामले को सात मई को फिर सुनवाई पर लगाने का आदेश दिया है। पीठ ने मामले पर टिप्पणी करते हुए कहा कि जो कुछ चल रहा है उससे वे बहुत परेशान हैं। जो भी हो रहा है वो बहुत दुर्भाग्यपूर्ण है। पीठ ने कहा कि कानून स्पष्ट है और सभी को कानून मालूम होना चाहिए। सांसदों को भी मालूम होना चाहिए। हालांकि सुनवाई के दौरान सीजेआई की चर्चा नहीं हुई। याचिका में कहा गया है कि जज के खिलाफ जांच पूरी नहीं हो जाती और कमेटी जज पर लगाए गए आरोपों में उसे दोषी नहीं ठहरा देती तबतक जज के आचरण पर इस तरह चर्चा नहीं की जा सकती। संविधान में इसकी मनाही है।

 

Posted By: Monika Minal