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यातायात उल्लंघन संबंधी अपराध खत्म किए जाने पर स्थिति स्पष्ट करे उत्तर प्रदेश सरकार, सुप्रीम कोर्ट का निर्देश

Published: Tue, 15 Sep 2026 10:20 PM (IST)

सुप्रीम कोर्ट ने उत्तर प्रदेश सरकार को यातायात उल्लंघन के मामलों को समाप्त करने पर स्थिति स्पष्ट करने का निर्देश दिया है।

स्थिति स्पष्ट करे उत्तर प्रदेश सरकार। (एएनआई)

स्थिति स्पष्ट करे उत्तर प्रदेश सरकार। (एएनआई)

HighLights

  1. सुप्रीम कोर्ट ने यूपी सरकार से यातायात उल्लंघन पर स्पष्टीकरण मांगा।

  2. गंभीर यातायात अपराधों को पुनर्जीवित करने के लिए अध्यादेश जारी हो।

  3. 2023 के कानून के तहत समाप्त मामले फिर से चलेंगे।

जागरण ब्यूरो, नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट ने उत्तर प्रदेश सरकार से यातायात उल्लंघन संबंधी अपराध खत्म किये जाने पर स्थिति स्पष्ट करने को कहा है।

शीर्ष अदालत ने राज्य सरकार से कहा है कि वह अध्यादेश के जरिये यह साफ करे कि मोटर वाहन अधिनियम 1988 के तहत गैर समझौता योग्य अपराधों, ऐसे अपराध जिनमें अनिवार्य जेल की सजा है और बार-बार किए गए अपराधों के लिए मुकदमे राज्य के 2023 के कानून में अभी भी समाप्त नहीं माने जाएंगे। यानी ऐसे मुकदमे पुनर्जीवित होंगे और चलेंगे।

यह निर्देश न्यायमूर्ति जेबी पार्डीवाला और केवी विश्वनाथन की पीठ ने सड़क सुरक्षा के मुद्दे पर सुनवाई के दौरान उस समय दिया, जब पीठ को बताया गया कि यातायात उल्लंघन संबंधी अपराध खत्म किये जाने को रिवाइव करने वाला अध्यादेश उत्तर प्रदेश सरकार ने जारी किया है। लेकिन उसमें अभी भी कानूनी खामी है।

कोर्ट एक अर्जी पर सुनवाई कर रहा था, जिसमें उत्तर प्रदेश आपराधिक कानून (अपराधों का समझौता और मुकदमों की समाप्ति) 2023 की वैधानिकता को चुनौती दी गई है। इस कानून के जरिये प्रदेश सरकार ने 31 दिसंबर 2021 तक मोटर वाहन अधिनियम के तहत लंबित अपराधों को खत्म कर दिया था।

अध्यादेश जारी कर स्थिति स्पष्ट करने का सुझाव कोर्ट ने तब दिया, जब मामले में न्याय मित्र वरिष्ठ अधिवक्ता गौरव अग्रवाल ने बताया कि इस कानून की वैधता का मुद्दा अभी भी बना हुआ है। भले ही राज्य सरकार ने अध्यादेश जारी कर दिया हो लेकिन उसमें तकनीकी खामी है।

हालांकि उत्तर प्रदेश सरकार की वकील ने कहा कि 2026 में राज्य सरकार अध्यादेश लाई है, जिसमें कहा गया है कि तीन श्रेणियों गैर समझौता योग्य अपराधों, ऐसे अपराध जिनमें अनिवार्य जेल की सजा है और बार-बार किए गए अपराधों के मुकदमे राज्य के 2023 के कानून में समाप्त नहीं माने जाएंगे।

इस पर पीठ ने उनसे पूछा कि उन मामलों का क्या होगा, जिनमें कानून के तहत अपराध पहले ही खत्म माने जा चुके हैं। प्रदेश सरकार के वकील ने बताया कि सरकार ने ऐसे मामलों की पहचान करने के लिए एक प्रक्रिया शुरू की है। प्रदेश के 75 जिलों में से 72 जिलों से जानकारी मिल चुकी है।

पीठ ने उनके जवाब पर गौर किया और सुझाव दिया कि सरकार एक और अध्यादेश जारी करे, जिसमें यह स्पष्ट किया जाए कि जिन मामलों को पहले ही खत्म माना जा चुका है, उनमें मुकदमे फिर से शुरू किये जाएंगे।

पीठ ने कहा कि इसे साफ शब्दों में कहें तो आप गैर समझौता योग्य अपराध, ऐसे अपराध जिनमें अनिवार्य रूप से जेल की सजा है और बार-बार किये गए अपराधों के मामलों को फिर से शुरू करेंगे।

कहा कि अगर ऐसा अध्यादेश जारी किया जाता है तो शायद कानून की वैधानिकता जांचने पर विचार की जरूरत न पड़े। जस्टिस केवी विश्वनाथन ने कहा कि अध्यादेश में यह स्पष्ट किया जाना चाहिए कि इन अपराधों को कभी भी खत्म नहीं माना गया। गौरव अग्रवाल ने कहा कि लेकिन कानून की संवैधानिकता का मुद्दा फिर भी बना रहेगा।

उस कानून को राष्ट्रपति की जरूरी मंजूरी नहीं है जो कि केंद्रीय कानूनों के मामले में होनी चाहिए। हालांकि कोर्ट ने मामला लंबित रखा है।

इसके अलावा कोर्ट ने व्यवसायिक वाहनों में स्पीड गवर्नेस और वाहन ट्रैकिंग उपकरण लगाने पर भी केंद्र सरकार और राज्यों से जवाब मांगा है। पीठ ने दिल्ली में हाई कोर्ट के पास पैदल यात्रियों के सड़क पार करने के बारे में फुट ओवर ब्रिज जैसी व्यवस्था किये जाने के बारे में पूछा।

पीठ को बताया गया कि वहां एक रेड लाइट लगा दी गई है। इस पर कोर्ट का कहना था कि क्या उससे समस्या समाधान हो गया। कहा कि लाल बत्ती लगाना भर काफी नहीं है। कोर्ट ने वहां स्पीड ब्रेकर और रंबल स्ट्रिप लगाने का सुझाव दिया। कोर्ट को बताया गया कि वहां सौ मीटर की दूरी पर चिड़ियाघर है और पुराना किला है। इसलिए वहां जगह कम है। फुट ओवर ब्रिज की भी बात चली।