नई दिल्ली, जागरण ब्यूरो। अभी दो दिन पहले ही सुप्रीम कोर्ट ने कार्य आवंटन और पीठों के गठन के प्रधान न्यायाधीश के विशेषाधिकार पर मुहर लगाई थी। लेकिन शुक्रवार को नये सिरे से यही मसला उठाने वाली पूर्व कानून मंत्री और वरिष्ठ वकील शांति भूषण की याचिका पर कोर्ट ने एक बार फिर विचार का मन बनाया है। कोर्ट ने मामले में औपचारिक नोटिस तो नहीं जारी किया लेकिन याचिका पर विस्तृत सुनवाई के लिए 27 अप्रैल की तिथि तय करते हुए अटार्नी जनरल केके वेणुगोपाल और एडीशनल सालिसिटर जनरल (एएसजी) तुषार मेहता से सुनवाई मे कोर्ट की मदद करने का आग्रह किया है।

शांति भूषण ने सुप्रीम कोर्ट मे जनहित याचिका दाखिल कर प्रधान न्यायाधीश के पीठों के गठन के विशेषाधिकार को चुनौती दी है। याचिका मे कहा गया है कि सीजेआई इस अधिकार का मनमाना इस्तेमाल नहीं कर सकते। सीजेआई पांच वरिष्ठतम न्यायाधशों जिसे कोलीजियम कहा जाता है के परामर्श से पीठों का गठन और कार्य आवंटन करें।

कोलीजियम नहीं तय कर सकती रोस्टर

हालांकि शुक्रवार को मामले की सुनवाई कर रहे न्यायमूर्ति एके सीकरी व न्यायमूर्ति अशोक भूषण की पीठ प्रथम दृष्टया भूषण की ओर से दी गई इन दलीलों से सहमत नहीं हुई कि सीजेआई का मतलब कोलीजियम है और सीजेआई को नहीं कोलिजियम को पीठों का गठन और कार्य आवंटन का काम करना चाहिए। जस्टिस सीकरी ने भूषण की ओर से दलीलें रख रहे वरिष्ठ वकील दुष्यंत दवे से कहा कि अगर ऐसा होगा तो कोलीजिमय को रोजाना या फिर सप्ताह में दो से तीन बार बैठक करनी होगी। ये व्यवहारिक नहीं है। इस पर दवे ने कहा कि सामान्य तौर पर तो मामलों का आवंटन रजिस्ट्रार कंप्यूटराइज प्रणाली से ही करते हैं लेकिन कुछ संवेदनशील मामलों के आवंटन में यह प्रक्रिया अपनाई जानी चाहिए। अकेले सीजेआई का यह विशेषाधिकार नहीं होना चाहिए।

ये तय हो चुका है कि सीजेआई मास्टर आफ रोस्टर हैं

कोर्ट ने दवे की दलीलें नकारते हुए कहा कि यह फैसला आ चुका है कि सीजेआई ही मास्टर आफ रोस्टर हैं। पीठ गठित करना उनका विशेषाधिकार है। इस पर दवे की दलील थी कि ये अधिकार निष्पक्ष और न्यायोचित होना चाहिए। उन्होंने कहा कि याचिका के साथ कई ऐसे मामलों के उदाहरण दिये गये हैं जिसमे पीठों का गठन सही नहीं है। कोर्ट का कहना था कि ये कैसे तय होगा कि कौन सा मामला संवेदनशील है और कौन सा नहीं। किसी भी मामले को लेकर अलग अलग विचार हो सकते हैं। पीठ ने कहा कि रोस्टर तय करना सीजेआई का ही अधिकार है लेकिन उसे इस्तेमाल करने के तरीके के बारे में आप सुझाव दे सकते हैं। पीठ ने कहा कि ये ठीक है कि कोई भी अधिकार मनमाना नहीं हो सकता इसीलिये हर फैसले की न्यायिक समीक्षा की व्यवस्था है। सुप्रीम कोर्ट के प्रत्येक जज का कर्तव्य है कि वह संविधान और कानून का संरक्षण करे।

जजों की कान्फ्रेंस का मामला उठाने से रोका

दवे ने जब पीठों के गठन के सीजेआई के अधिकारों पर सावल उठाते हुए सुप्रीम कोर्ट के चार वरिष्ठ न्यायाधीशों की प्रेस कान्फ्रेस का हवाला दिया तो पीठ ने उन्हें बीच मे ही रोकते हुए कहा कि वे इसकी चर्चा न करें। कोर्ट इस पर सुनवाई और विचार नहीं करेगा। जो मामला सामने है उसी पर बहस करें।

एक व्यक्ति मे शक्ति निहित हो ये ठीक नहीं

दवे के साथ ही कपिल सिब्बल ने खड़े होकर कहा कि एक व्यक्ति में शक्ति निहित होना ठीक नहीं है। ये स्वीकार्य नहीं है। वे किसी व्यक्ति विशेष के खिलाफ नहीं हैं लेकिन ये व्यवस्था न्यायोचित नहीं है।

Posted By: Monika Minal