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'आपराधिक मामलों में निजी विचार थोपने से बचें अदालतें', मध्य प्रदेश हाई कोर्ट के आदेश पर सुप्रीम कोर्ट सख्त

Published: Thu, 01 Oct 2026 06:20 AM (GMT+05:30)

सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि जमानत याचिकाओं और आपराधिक मामलों में निर्णय लेते समय अदालतों को नैतिकता को लेकर अपनी निजी राय या मूल्य-आधारित निष्कर्ष थोपने से बचना चाहिए।

आपराधिक मामलों में निजी विचार थोपने से बचें अदालतें- सुप्रीम कोर्ट

आपराधिक मामलों में निजी विचार थोपने से बचें अदालतें- सुप्रीम कोर्ट

HighLights

  1. मध्य प्रदेश हाई कोर्ट का आदेश रद करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने दी जमानत

  2. पीठ ने यौन उत्पीड़न से जुड़े एक मामले में टिप्पणी की है

पीटीआई, नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि जमानत याचिकाओं और आपराधिक मामलों में निर्णय लेते समय अदालतों को नैतिकता को लेकर अपनी निजी राय या मूल्य-आधारित निष्कर्ष थोपने से बचना चाहिए।

जस्टिस उज्ज्वल भुइयां और एएस चंदुरकर की पीठ ने यौन उत्पीड़न से जुड़े एक मामले में मध्य प्रदेश हाई कोर्ट के आदेश को रद करते हुए यह टिप्पणी की।

हाई कोर्ट ने आरोपित को यह कहते हुए जमानत देने से इनकार कर दिया गया था कि इससे सामाजिक व्यवस्था और पीड़िता के परिवार के मनोबल पर असर पड़ सकता है।

लेकिन, सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि याचिकाकर्ता एक साल से ज्यादा समय तक जेल में रह चुका है। मुकदमे की सुनवाई पूरी होने में अभी कुछ और समय लगेगा। ऐसी स्थिति में हमारी राय है कि जमानत का मामला बनता है।

शीर्ष अदालत ने 23 सितंबर के अपने आदेश में कहा-याचिकाकर्ता मध्य प्रदेश के रतलाम जिले में भारतीय न्याय संहिता, यौन अपराधों से बच्चों का संरक्षण (पाक्सो) अधिनियम और अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम की विभिन्न धाराओं के तहत दर्ज मामले में आरोपित है।

याचिकाकर्ता पीड़िता के पड़ोस में किराये पर रहता था। उस पर आरोप है कि विवाहित होने के बावजूद उसने पीड़िता की बड़ी बहन का अपहरण करने की कोशिश की।

इसके बाद पीड़िता ने अपनी मां को बताया कि याचिकाकर्ता ने लगभग एक महीने तक उसका यौन शोषण भी किया, जिसके चलते मामला दर्ज किया गया।