'राजस्व रिकॉर्ड में नाम बदलने से मालिकाना हक नहीं होता खत्म', जमीन विवाद पर SC की अहम टिप्पणी
सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि राजस्व रिकॉर्ड में नाम बदलने से किसी का मालिकाना हक खत्म नहीं होता, ...और पढ़ें

कनाडिया जमीन विवाद मामले में सुप्रीम कोर्ट की अहम टिप्पणी
HighLights
राजस्व रिकॉर्ड में नाम बदलने से मालिकाना हक स्वतः समाप्त नहीं होता।
नामांतरण मुख्य रूप से राजस्व संबंधी उद्देश्यों के लिए होता है, स्वामित्व नहीं।
हाई कोर्ट निचली अदालतों के समवर्ती तथ्यात्मक निष्कर्षों को नहीं पलट सकता।
जागरण ब्यूरो, नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट ने एक अहम फैसले में स्पष्ट किया है कि राजस्व रिकॉर्ड में किसी व्यक्ति का नाम दर्ज हो जाने मात्र से दूसरे व्यक्ति का मालिकाना हक खत्म नहीं होता।
शीर्ष अदालत ने कहा कि राजस्व अभिलेख में नामांतरण मुख्य रूप से राजस्व संबंधी उद्देश्यों के लिए होता है और इससे अपने आप स्वामित्व पैदा या समाप्त नहीं होता।
कोर्ट ने यह भी कहा कि हाई कोर्ट दूसरी अपील पर सुनवाई करते हुए निचली अदालतों के समवर्ती तथ्यात्मक निष्कर्षों को महज इसलिए नहीं पलट सकता कि उसे साक्ष्यों की अलग व्याख्या अधिक उचित लगती है। ये फैसला जस्टिस संजय करोल और जस्टिस एजी मसीह की पीठ ने मध्यप्रदेश के एक मामले में गत 20 अगस्त को दिया।
पीठ ने कहा कि यह स्थापित कानूनी सिद्धांत है कि राजस्व अभिलेख में की गई प्रविष्टि न तो स्वामित्व का सृजन करती है और न ही स्वामित्व को समाप्त करती है। ऐसी प्रविष्टि मूलतः राजस्व संबंधी उद्देश्यों के लिए होती है।
नायब तहसीलदार का आदेश राजस्व अभिलेखों को नियंत्रित या व्यवस्थित कर सकता है, लेकिन केवल एक व्यक्ति के स्थान पर दूसरे का नाम दर्ज कर देने मात्र से वह आदेश स्वामित्व के हस्तांतरण या स्वामित्व अधिकारों के त्याग के रूप में प्रभावी नहीं हो सकता।
मूल स्वामित्व का निर्धारण करने का अधिकार दीवानी अदालत के पास पूरी तरह बना रहता है। राजस्व अभिलेख की प्रविष्टि स्वामित्व का अनुसरण करती है, स्वामित्व का सृजन नहीं करती। मध्य प्रदेशभू-राजस्व संहिता, 1959 की धारा 117 के तहत राजस्व अभिलेख में दर्ज प्रविष्टि की शुद्धता के संबंध में जो वैधानिक अनुमान लगाया जाता है, वह केवल खंडनीय साक्ष्यगत अनुमान है, यानी ऐसा साक्ष्य अनुमान जिसका खंडन किया जा सकता है।
इसे स्वामित्व का अनुमान नहीं माना जा सकता। इस अनुमान का मूल्यांकन मामले में उपलब्ध अन्य सभी साक्ष्यों के साथ किया जाना आवश्यक है।
पीठ ने कहा कि हाई कोर्ट ने यह मानकर गलती की कि रामप्रसाद ने विवादित संपत्ति में अपने स्वामित्व अधिकार का त्याग कर दिया था। सुप्रीम कोर्ट ने मध्य प्रदेश हाई कोर्ट का नौ मई 2025 का फैसला रद कर दिया और ट्रायल कोर्ट व प्रथम अपीलीयी कोर्ट का फैसला बहाल कर दिया है।
ये मामला इंदौर के कनाड़िया गांव में कृषि भूमि और उस पर बने मकान से संबंधित था। यह संपत्ति भगवान सिंह के नाम थी। उनकी मृत्यु के बाद उनके दो पुत्रों रामप्रसाद और वासुदेव के नाम राजस्व रिकार्ड में संयुक्त रूप से दर्ज हुए। बाद में रामप्रसाद का नाम रिकार्ड से हटा दिया गया और जमीन के अलग अलग हिस्से वासुदेव व उसके पुत्र जसवंत के नाम दर्ज कर दिए गए।
रामप्रसाद के कानूनी वारिसों ने सह-स्वामित्व, बंटवारे और अलग कब्जे के अधिकार के लिए मुकदमा दायर किया। दूसरी ओर प्रतिवादी यानी वासुदेव ने दावा किया कि रामप्रसाद ने 1990 में शपथपत्र, नायब तहसीलदार के समक्ष बयान और बाद में लिखित सहमति के जरिए संपत्ति में अपना हिस्सा छोड़ दिया था।
ट्रायल कोर्ट ने इन दावों को साबित नहीं माना। प्रथम अपीलीय अदालत ने भी पाया कि हिस्सा छोड़ देने की पुष्टि के लिए स्वतंत्र गवाह पेश नहीं किया गया था और दस्तावेजों से जुड़े साक्ष्यों में विरोधाभास था। दोनों अदालतों ने रामप्रसाद के परिवार के पक्ष में फैसला दिया। लेकिन हाई कोर्ट ने निचली अदालतों का फैसला पलट दिया था।
सुप्रीम कोर्ट ने हाई कोर्ट के फैसले को गलत ठहराते हुए कहा कि अचल संपत्ति में अधिकार छोड़ने का दावा करने वाले पक्ष पर यह साबित करने का दायित्व है कि स्वामित्व वास्तव में कानूनी रूप से छोड़ा गया था। सिर्फ बाद में राजस्व रिकार्ड में किसी दूसरे व्यक्ति का नाम आ जाने से यह नहीं माना जा सकता कि संपत्ति पर अधिकार स्वेच्छा से छोड़ दिया गया था।
पीठ ने स्पष्ट किया कि दूसरी अपील में हाई कोर्ट का अधिकार क्षेत्र सीमित है। सुप्रीम कोर्ट ने रामप्रसाद के कानूनी वारिसों के सह-स्वामित्व के अधिकार को मान्यता दी है। उनके हिस्से का निर्धारण कानून के अनुसार बंटवारे के जरिए करने का निर्देश दिया है।
जमीन का वैध बंटवारा होने तक प्रतिवादी विवादित संपत्ति को बेंच नहीं सकेंगे और न ही उसमें किसी तीसरे पक्ष का अधिकार पैदा कर सकेंगे।
