EC का स्वतंत्र होना भर पर्याप्त नहीं, उसे स्वतंत्र दिखना भी चाहिए; चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति प्रक्रिया पर बोला सुप्रीम कोर्ट
सुप्रीम कोर्ट ने चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति प्रक्रिया पर केंद्र सरकार से सवाल उठाते हुए कहा कि चुनाव आयोग को स्वतंत्र दिखना भी चाहिए।
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चुनाव आयोग की स्वतंत्रता पर शीर्ष अदालत की टिप्पणी

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जागरण ब्यूरो, नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट ने चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति के मामले पर विचार करते हुए गुरुवार को चुनाव आयोग की स्वतंत्रता को लेकर केंद्र सरकार से कई सवाल किये। कोर्ट ने कहा कि चुनाव आयोग का स्वतंत्र होना भर पर्याप्त नहीं है, उसे स्वतंत्र दिखना भी चाहिए।
स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव मूलढांचे का हिस्सा माना जाता है, यह स्वतंत्र चुनाव आयोग द्वारा ही संभव है। चुनाव आयोग तभी स्वतंत्र हो सकता है जबकि उसके चुनाव आयुक्त भी स्वतंत्र हों।
शीर्ष अदालत ने चुनाव आयुक्तों का चयन करने वाली समिति में एक तटस्थ व्यक्ति होने पर जोर दिया और चयन समिति में कैबिनेट मंत्री के शामिल होने पर सवाल उठाया। कोर्ट ने कहा कि कैबिनेट मंत्री, प्रधानमंत्री के खिलाफ कैसे जाएगा। ऐसे तो नेता विपक्ष की भूमिका सिर्फ दिखावे की ही रहेगी। मामले में कोर्ट अगले सप्ताह फिर सुनवाई करेगा।
सुप्रीम कोर्ट में कई याचिकाएं लंबित हैं जिनमें मुख्य चुनाव आयुक्त और चुनाव आयुक्त (नियुक्ति सेवा शर्तें और कार्यकाल) अधिनियम 2023 को चुनौती दी गई है। चुनौती देने का मुख्य आधार चयन पैनल से भारत के प्रधान न्यायाधीश (सीजेआइ) को बाहर करना है। मामले की सुनवाई न्यायमूर्ति दीपांकर दत्ता और सतीश चंद्र शर्मा की पीठ कर रही है जिसने ये टिप्पणियां कीं।
याचिकाकर्ताओं की दलील है कि सुप्रीम कोर्ट की पांच न्यायाधीशों की पीठ ने अनूप बरनवाल मामले में दिए फैसले में चयन समिति में प्रधानमंत्री, लोकसभा में नेता विपक्ष और सीजेआइ को रखा था जबकि इसके बाद बने कानून में चयन समिति में सीजेआइ को बाहर कर कर उनकी जगह कैबिनेट मंत्री को शामिल किया गया है। इससे चुनाव आयोग की स्वतंत्रता और निष्पक्षता खतरे में पड़ गई है क्योंकि चयन में सरकार का ही बहुमत है।
याचिकाकर्ताओं की ओर से पेश वरिष्ठ वकील विजय हंसारिया, गोपाल शंकर नारायण व अन्य ने कहा कि यहां सवाल यह है कि सुप्रीम कोर्ट के फैसले का आधार समाप्त किये बगैर इसके खिलाफ कानून कैसे बनाया जा सकता है। हालांकि पिछली सुनवाई में कहा था कि सुप्रीम कोर्ट का फैसला कानून बनने तक अंतरिम व्यवस्था थी और कानून बनाना संसद का विशेषाधिकार है, कोर्ट संसद को निर्देश नहीं दे सकता।
गुरुवार को जब केंद्र सरकार की ओर से अटार्नी जनरल आर. वेंकटरमणी ने बहस करनी शुरू की तो कोर्ट ने उनसे कई सवाल किये। लोकतंत्र में चुनाव आयोग की स्वतंत्रता पर बल देते हुए चयन समिति में एक तटस्थ सदस्य के होने की जरूरत पर जोर दिया।
कोर्ट ने कहा कि अगर प्रधानमंत्री किसी एक को चुनते हैं और नेता विपक्ष किसी दूसरे को चुनता है तो दोनों को बीच असहमति होने पर क्या तीसरा सदस्य नेता विपक्ष का साथ देगा। क्या कैबिनेट मंत्री प्रधानमंत्री खिलाफ जाएगा।
अटार्नी जनरल ने स्वीकार किया कि व्यावहारिक रूप में शायद ऐसा न हो। कोर्ट ने कहा कि तब तो कार्यपालिका ही सबकुछ नियंत्रित कर रही है। अगर फैसला हमेशा 2-1 के बहुमत से कार्यपालिका के पक्ष में जाएगा तो नेता विपक्ष को समिति में रखने का क्या औचित्य है।
पीठ ने कहा कि पहली नजर में यह बात परेशान करती है कि आखिर एक्जीक्यूटिव का वीटो क्यों। कोर्ट ने सीबीआइ निदेशक की नियुक्ति में सीजेआइ के शामिल होने का भी उदाहरण दिया। हालांकि कहा कि वह ये नहीं कह रहे कि सीजेआइ जरूर शामिल हो और उनके अलावा कोई और नहीं हो सकता लेकिन तीसरा सदस्य तटस्थ व्यक्ति क्यों नहीं होना चाहिए।
सुनवाई के दौरान अटार्नी जनरल ने मामले में महत्वपूर्ण संवैधानिक प्रश्न शामिल होने के आधार पर केस को पांच न्यायाधीशों की संविधान पीठ को विचार के लिए भेजने की मांग की। याचिकार्ताओं के वकीलों ने इसका विरोध किया और कहा कि दो न्यायाधीश की पीठ ही इस पर फैसला दे सकती है क्योंकि पहले से ही पांच न्यायाधीशों का अनूप बरनवाल का फैसला मौजूद है।
पीठ ने कहा कि चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति से संबंधित यह कानून 70 साल बाद पहली बार बना है और कभी भी कोर्ट ने इससे पहले इस कानून पर विचार नहीं किया है।
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