नई दिल्ली, आइएएनएस। सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को इस बात पर विचार किया कि अदालतों की आलोचना के लिए लोगों को खराब भाषा का इस्तेमाल करने से रोकने के लिए एक उपयुक्त अंकुश क्या होना चाहिए। जस्टिस एसके कौल ने कहा कि हम फांसी के दर्शन में विश्वास नहीं करते हैं। एक उपयुक्त अंकुश क्या होना चाहिए। शीर्ष अदालत ने गुजरात हाई कोर्ट अधिवक्ताओं के एसोसिएशन (जीएचसीएए) के अध्यक्ष यतिन ओझा के वरिष्ठ पदनाम को वापस लेने के खिलाफ एक याचिका की सुनवाई के दौरान यह विचार सामने रखा।

गुजरात हाई कोर्ट ने पिछले साल अवमानना के एक मामले में ओझा की वरिष्ठ वकील की मान्यता वापस ले ली थी। इस मामले में जीएचसीएए ओर ओझा की ओर से शीर्ष अदालत में वकीलों के एक समूह ने दलीलें दीं। उन्होंने कहा कि किसी वकील से वरिष्ठ की मान्यता वापस लेना मौत के समान है। क्योंकि इससे उसका कैरियर तबाह हो जाता है। वरिष्ठ अधिवक्ता अरविंद दातार ने कहा, ओझा का गाउन पिछले साल जुलाई में हटा दिया गया था और वह तब से वे शायद ही अदालत गए हों। अब फिर से ऐसा करने का कोई सवाल ही नहीं है। उनका पर्याप्त अपमान हो चुका है।

इस पर शीर्ष अदालत ने कहा कि हाई कोर्ट की भावनाओं को ध्यान में रखते हुए, एक संतुलित रास्ता निकालने की आवश्यकता है, क्योंकि एक पूर्ण अदालत ने ओझा के खिलाफ कार्रवाई करने का फैसला किया। कोर्ट ने कहा एक पूर्ण अदालत को किसी सर्वसम्मत निर्णय पर पहुंचना बहुत मुश्किल काम है। यदि आप अपने आचरण से इस तरह के फैसले को आमंत्रित करते हैं, तो कुछ न कुछ जरूर किया जाना चाहिए।

उन्होंने कहा कि कोई नहीं कहता कि आप कोर्ट रजिस्ट्री की आलोचना नहीं कर सकते। लेकिन भाषा की मर्यादा बनाए रखनी चाहिए। शीर्ष अदालत ने कहा कि बहुत सी बातें अच्छे तरीके से कही जा सकती हैं। जीएचसीएए का प्रतिनिधित्व करने वाले वरिष्ठ अधिवक्ता सी.ए. सुंदरम ने शीर्ष अदालत ओझा की बिना शर्त माफी पर विचार करने का आग्रह किया।

ओझा का प्रतिनिधित्व कर रहे वरिष्ठ वकील अभिषेक मनु सिंघवी ने कहा कि उनके मुवक्किल ने बिना शर्त माफी मांगी है और यह अलग बात है कि कोई भी माफी स्वीकार करने को तैयार नहीं है। सिंघवी ने ओझा की ओर से कहा कि इस मामले को और आगे बढ़ाने की जरूरत नहीं है। मैंने अपने जीवन का सबक सीखा है।

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