'अब आरोपित को दोबारा गिरफ्तार करने के लिए मजिस्ट्रेट की मंजूरी होगी जरूरी', SC का ऐतिहासिक फैसला
सुप्रीम कोर्ट ने एक ऐतिहासिक फैसले में कहा है कि संवैधानिक नियमों के उल्लंघन पर रिहा हुए आरोपी को दोबारा गिरफ्तार करने के लिए मजिस्ट्रेट की पूर्व अनुमति अनिवार्य होगी।
-1790011852223_m.webp)
आरोपित को दोबारा गिरफ्तार करने के लिए मजिस्ट्रेट की मंजूरी जरूरी
HighLights
संवैधानिक उल्लंघन पर रिहा आरोपी की दोबारा गिरफ्तारी को मंजूरी।
मजिस्ट्रेट की पूर्व अनुमति अब दोबारा गिरफ्तारी के लिए अनिवार्य।
पुलिस अधिकारियों की जवाबदेही तय, उल्लंघन पर होगी कार्रवाई।
डिजिटल डेस्क, नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट ने व्यक्तिगत स्वतंत्रता और नागरिकों के मौलिक अधिकारों की रक्षा की दिशा में एक बेहद महत्वपूर्ण और ऐतिहासिक फैसला सुनाया है। कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि यदि किसी आरोपित को गिरफ्तारी के कारणों की जानकारी न दिए जाने या 24 घंटे के भीतर मजिस्ट्रेट के समक्ष पेश न किए जाने जैसे संवैधानिक नियमों के उल्लंघन के कारण रिहा कर दिया जाता है, तो जांच एजेंसी अपनी मर्जी से उसे दोबारा गिरफ्तार नहीं कर सकती।
अब दोबारा गिरफ्तार करने के लिए मजिस्ट्रेट की पूर्व अनुमति यानी न्यायिक मुहर लेना अनिवार्य होगा।
जस्टिस उज्ज्वल भुइयां और जस्टिस ए.एस. चंद्रचूड़ की पीठ ने अपने इस फैसले में संविधान के अनुच्छेद 22(1) और 22(2) की महत्ता को रेखांकित किया। कोर्ट ने दो टूक शब्दों में कहा कि संविधान के इन प्रविधानों को किसी भी स्थिति में कमतर नहीं आंका जा सकता और न ही इनके साथ किसी प्रकार का खिलवाड़ बर्दाश्त किया जाएगा।
पीठ ने कहा कि जब किसी नागरिक की व्यक्तिगत स्वतंत्रता को कानून या संविधान द्वारा छीना जाता है, तो यह कोर्ट का परम कर्तव्य है कि वह यह सुनिश्चित करे कि उन निर्धारित प्रक्रियाओं का पूरी सख्ती के साथ पालन हुआ हो। यह नियम अपराध की प्रकृति या उसकी गंभीरता से परे है और हर श्रेणी के अपराध पर समान रूप से लागू होता है।
क्या है नई प्रक्रिया और जवाबदेही?
फैसले के अनुसार, यदि रिहाई के बाद भी जांच एजेंसी को लगता है कि मामले की निष्पक्ष जांच और पूछताछ के लिए आरोपित की हिरासत जरूरी है, तो उसे संबंधित मजिस्ट्रेट के पास एक औपचारिक आवेदन देना होगा। इस आवेदन में इन बातों का होना अनिवार्य है।
विलंब का कारण
पहली बार गिरफ्तारी के समय आधार क्यों नहीं बताए गए, इसका स्पष्टीकरण देना होगा। आधारों की तामील - आरोपित को पहले गिरफ्तारी के आधार लिखित रूप में उपलब्ध कराने होंगे।
उच्चाधिकारियों की मुहर
किसी भी प्रकार की मिलीभगत या मनमानी को रोकने के लिए आवेदन पर तत्काल वरिष्ठ अधिकारी का अनुमोदन होना जरूरी है। त्वरित निर्णय - मजिस्ट्रेट प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों का पालन करते हुए आमतौर पर एक सप्ताह के भीतर इस पर अपना फैसला सुनाएंगे।
पुलिस अधिकारियों की जवाबदेही तय
सुप्रीम कोर्ट ने वर्ष 2025 के 'मिहिर राजेश शाह' मामले के सुरक्षा उपायों को और अधिक मजबूत करते हुए स्पष्ट निर्देश दिए हैं कि यदि कोई पुलिस अधिकारी संवैधानिक प्रविधानों का उल्लंघन करता है, तो उसके खिलाफ सख्त कदम उठाए जाने चाहिए। वरिष्ठ अधिकारी आवेदन पर हस्ताक्षर करने के साथ-साथ मामले की जांच किसी अन्य अधिकारी को सौंपेंगे और दोषी पुलिसकर्मी के खिलाफ विभागीय जांच के आदेश देंगे।
यदि जांच में अधिकारी दोषी पाया जाता है, तो उसके सर्विस बुक में इसकी प्रतिकूल प्रविष्टि दर्ज की जाएगी। इस फैसले के साथ ही सुप्रीम कोर्ट ने पंजाब और हरियाणा हाईकोर्ट के उस आदेश को रद कर दिया, जिसमें एक पोक्सो मामले के आरोपित जसकरन जीत सिंह देओल की रिहाई के बाद पुलिस को बिना न्यायिक अनुमति के दोबारा गिरफ्तारी की छूट दी गई थी।
कोर्ट का यह फैसला खाकी की मनमानी पर लगाम लगाने और आम नागरिकों के संवैधानिक अधिकारों की रक्षा की दिशा में मील का पत्थर साबित होगा।
गिरफ्तारी की वजह न बताना मौलिक अधिकारों का उल्लंघन है- सुप्रीम कोर्ट
सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को कहा कि अगर किसी व्यक्ति को उसकी गिरफ्तारी की वजह नहीं बताई जाती है, तो यह उसके मौलिक अधिकारों का उल्लंघन होगा। इससे संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत उसके जीवन और व्यक्तिगत आजादी के अधिकार में कटौती होगी और गिरफ्तारी गैर-कानूनी हो जाएगी।
कोर्ट ने यह भी कहा कि अनुच्छेद 22(1) के प्रविधानों को सीमित नजरिये से नहीं देखा जा सकता; वरना, व्यक्तिगत आजादी को सुरक्षित रखने का इसका मकसद पूरा नहीं हो पाएगा, बल्कि यह सीमित हो जाएगा और बेकार हो जाएगा। कोर्ट ने कहा कि गिरफ्तारी की वजह लिखित में और ऐसी भाषा में होनी चाहिए जिसे आरोपित समझ सके।
(समाचार एजेंसी पीटीआई के इनपुट के साथ)
