'सौतेली बेटी के यौन शोषण व हत्या के दोषी का मृत्युदंड उम्रकैद में बदला', सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला
सुप्रीम कोर्ट ने सौतेली बेटी के यौन शोषण व हत्या के दोषी की मौत की सजा को उम्रकैद (बाकी बची जिंदगी) में बदल दिया है।

शीर्ष अदालत ने सौतेली बेटी के यौन शोषण व हत्या के दोषी का मृत्युदंड उम्रकैद में बदला
HighLights
पीड़िता की मां की गवाही को भरोसेमंद माना, कहा- हिंसा की शिकार महिला की चुप्पी सामान्य बात
पति की शिकायत न कर पाना नहीं हो सकता गवाही पर संदेह का आधार, दोषी ने गवाही पर उठाया था सवाल
पीटीआई, नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट ने सौतेली बेटी के यौन शोषण व हत्या के दोषी की मौत की सजा को उम्रकैद (बाकी बची जिंदगी) में बदल दिया है।
जस्टिस विक्रम नाथ, जस्टिस संदीप मेहता और जस्टिस विजय बिश्नोई की पीठ ने सुनवाई के दौरान पीड़िता के मां की गवाही को भरोसेमंद माना और कहा कि घरेलू हिंसा और यौन उत्पीड़न की शिकार महिलाओं का चुप रहना कोई अपवाद नहीं, बल्कि सामान्य बात है।
महिला द्वारा अपने जीवनसाथी या परिवार के खिलाफ शारीरिक या यौन शोषण की तुरंत शिकायत न कर पाना उसकी गवाही पर संदेह का आधार नहीं हो सकता।
इस मामले में छह वर्ष की सौतेली बेटी का बार-बार यौन शोषण और उसकी गला घोंटकर हत्या के लिए सत्र अदालत ने सौतेले पिता को मौत की सजा सुनाई थी जिसे मध्य प्रदेश हाई कोर्ट की इंदौर पीठ ने नवंबर 2019 में सही ठहराया था।
दोषी ने हाई कोर्ट के इस फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी थी।सुप्रीम कोर्ट ने 157 पन्नों के फैसले में कहा कि घटना की एकमात्र चश्मदीद गवाह पीड़िता की मां थी। घर में होने वाले शोषण की सच्चाई समझने वाली अदालत को इस चाल के प्रति सावधान रहना चाहिए और सुनिश्चित करना चाहिए कि शोषण करने वाले व्यक्ति को हिंसा की शिकार महिला की मजबूरियों का फायदा न मिल पाए।
दोषी की दलील थी कि उसे अपनी पत्नी की गवाही के आधार पर सजा नहीं दी जा सकती, जिसने इस अपराध के बारे में लंबे समय तक चुप्पी साध रखी थी।
हालांकि पीठ ने दोषी की मौत की सजा को उम्रकैद में बदल दिया।पीठ ने गौर किया कि 2019 से 2021 के बीच किए गए पांचवें राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण (एनएफएचएस-5) के अनुसार भारत में 18 से 49 वर्ष आयुवर्ग की लगभग 29.3 प्रतिशत विवाहित महिलाओं ने पति द्वारा शारीरिक या यौन हिंसा झेलने की बात कही थी। जिन महिलाओं ने इस तरह की हिंसा का सामना किया था, उनमें से लगभग तीन-चौथाई महिलाओं ने कभी किसी से मदद नहीं मांगी।
शीर्ष अदालत ने कहा, सर्वेक्षण के आंकड़े साबित करते हैं कि शोषण के बाद महिलाओं का चुप रहना आम बात है। घटना की शिकायत न करना भी ऐसी असामान्य बात नहीं है, जिस पर शक किया जाए।
पीठ ने कहा, ऐसा कोई मॉडल तरीका नहीं है जिसके आधार पर किसी पीड़ित या गवाह के व्यवहार को मापा जा सके और अगर वह उस पर खरा न उतरे, तो उसे झूठा करार दिया जा सके।
पीड़िता की मां का जिक्र करते हुए पीठ ने कहा कि वह अपनी पहली शादी के बाद विधवा हो गईं, उसके पास अपनी कोई आमदनी का जरिया नहीं था। उसने दूसरी शादी की तथा अपने बच्चे को उसके घर ले आई थीं। इस घर में उसका उत्पीड़न किया गया। वह उसी से बात कर सकती थी जिनसे बात करने के लिए पति इजाजत देता था।
ऐसी स्थिति में फंसी महिला से यह उम्मीद नहीं की जा सकती कि वह मौका मिलते ही पुलिस स्टेशन चली जाएगी। घर में उसकी जबरदस्ती थोपी गई चुप्पी को मिलीभगत मानना और साथ ही हर उस मौके पर उसके विरोध को नजरअंदाज करना जहां विरोध मुमकिन था, गलत होगा।
शीर्ष अदालत ने कहा, अपराध बहुत गंभीर है और इसमें असाधारण गंभीर पहलू भी है, लेकिन अपील करने वाले के पक्ष में कुछ ठोस और वास्तविक बातें भी हैं। सरकार ने उसके सुधरने की संभावना को पूरी तरह से खारिज नहीं किया।
पीठ ने कहा कि दोषी को दी गई सजा, मौत की सजा के बाद सबसे सख्त है। इसके तहत उसे अपनी बाकी जिंदगी बिना किसी छूट के जेल की चारदीवारी के भीतर बितानी होगी। बच्ची की मां के बयान का जिक्र करते हुए पीठ ने कहा कि यह बयान भरोसेमंद था और ठोस मेडिकल साक्ष्यों और फोन रिकार्ड से भी इसकी पुष्टि हुई थी।
