'मोबाइल को दीवार पर मार दीजिए', डिजिटल अरेस्ट के मामलों से CJI हैरान; बैंकों की तय होगी जवाबदेही
सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि यदि वित्तीय संस्थान की लापरवाही से डिजिटल धोखाधड़ी होती है, तो पीड़ितों को गंवाई गई रकम का मुआवजा मिलना चाहिए।

सुप्रीम कोर्ट ने बैंकों की जवाबदेही तय करने पर जोर दिया।
HighLights
बैंक की लापरवाही पर डिजिटल धोखाधड़ी पीड़ितों को मुआवजा।
सुप्रीम कोर्ट ने बैंकों की जवाबदेही तय करने पर जोर दिया।
आरबीआई को धोखाधड़ी रोकथाम के कड़े नियम बनाने के निर्देश।
डिजिटल डेस्क, नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को कहा कि किसी वित्तीय संस्थान की उचित जांच-पड़ताल की विफलता के कारण अगर डिजिटल धोखाधड़ी का अपराध हुआ है, तो पीड़ितों को कम-से-कम गंवाई गई रकम के बराबर मुआवजा मिलना चाहिए।
शीर्ष अदालत ने बैंकों की जवाबदेही तय करने और धोखाधड़ी रोकने के लिए कड़े प्रविधान करने पर भी जोर दिया। प्रधान न्यायाधीश सूर्यकांत, जस्टिस जोयमाल्या बागची एवं जस्टिस वी. मोहना की पीठ ने कहा कि साइबर अपराध के मामलों में 50 प्रतिशत की कमी आने के बावजूद इस वर्ष अब तक लोगों को करीब 800 करोड़ रुपये का नुकसान उठाना पड़ा है।
पीठ ने कहा कि भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआइ) के प्रस्तावित नियामक ढांचे में मुआवजे, धोखाधड़ी की रोकथाम और वित्तीय संस्थानों की जवाबदेही के स्पष्ट प्रविधान होने चाहिए। नियामक प्रक्रिया को आगे बढ़ाने की अनुमति देने पूर्व अदालत पहले आरबीआइ के प्रस्तावित ‘अपने ग्राहक को जानें (केवाईसी) संशोधन निर्देश, 2026’ की समीक्षा करेगी।
इन निर्देशों को 30 नवंबर तक अधिसूचित करने और 31 दिसंबर तक लागू करने का प्रस्ताव है।पीठ ने अपने आदेश में कहा, 'आरबीआइ के प्रस्तावित नियामकीय उपायों में वित्तीय संस्थानों के लिए डिजिटल अरेस्ट या साइबर धोखाधड़ी के पीड़ितों को उचित मुआवजा देना अनिवार्य होना चाहिए।
यह मुआवजा ग्राहक की गंवाई गई रकम से कम नहीं होना चाहिए, बशर्ते यह पाया जाए कि धोखाधड़ी वित्तीय संस्थान की उचित जांच-पड़ताल में नाकामी के कारण हुई।'
प्रधान न्यायाधीश ने कहा कि बैंकों के विरुद्ध दंडात्मक प्रविधान जरूरी हैं, अन्यथा वे अपनी कार्यप्रणाली में सुधार नहीं करेंगे। उन्होंने कहा 'डिजिटल अरेस्ट' के जरिये हजारों करोड़ रुपये की धोखाधड़ी हुई है और हम अभी भी कोई बहुत सख्त कदम उठाने में असमर्थ हैं।
बैंक, खातों को उनकी प्रकृति और लेन-देन के तरीके के आधार पर अलग-अलग श्रेणियों में क्यों नहीं बांट सकते और संदिग्ध गतिविधियों की पहचान के लिए कृत्रिम मेधा (एआइ) का इस्तेमाल क्यों नहीं कर सकते।
उन्होंने कहा, 'बैंकों के पास खाताधारकों के लेन-देन का पूरा ब्योरा होता है। ऐसे में यदि कोई व्यक्ति, जो सामान्य तौर पर छोटी रकम का लेनदेन करता है, अचानक बड़ी रकम भेजने की कोशिश करता है, तो बैंक को हस्तक्षेप करना चाहिए।'
पीठ ने कहा कि बैंकों को खाताधारक के सामान्य लेन-देन से अलग असामान्य लेन-देन को कुछ समय के लिए रोकने, संदिग्ध गतिविधियों की स्वचालित सूचना देने और जरूरत पड़ने पर खाताधारक से सीधे संपर्क कर लेन-देन की पुष्टि करने की व्यवस्था करनी चाहिए।
शीर्ष अदालत ने ऐसी व्यवस्था बनाने को भी कहा जिसमें डिजिटल अरेस्ट के संभावित शिकार ग्राहकों के खातों में संदिग्ध और बड़ी रकम का लेन-देन होने पर नजदीकी पुलिस थानों को खुद ही सूचना दी जाए। इससे पुलिस समय रहते खाताधारक से संपर्क कर सकती है।
प्रधान न्यायाधीश ने कहा कि रकम खाते से निकल जाने के बाद जांच करना पर्याप्त नहीं है। रिपोर्ट तो घटना के बाद की महज पड़ताल होगी। हमारी चिंता इसे रोकने को लेकर है। 'डिजिटल अरेस्ट' साइबर धोखाधड़ी का एक तरीका है, जिसमें ठग खुद को पुलिस या किसी जांच एजेंसी का अधिकारी बताकर लोगों को गिरफ्तारी का डर दिखाते हैं और पैसे ऐंठते हैं।
अटार्नी जनरल आर. वेंकटरमणी ने अदालत को बताया कि आरबीआइ बैंकिंग संस्थानों और उनके कर्मचारियों की जवाबदेही के विभिन्न पहलुओं पर विचार कर रहा है। इसमें धोखाधड़ी में कर्मचारियों की मिलीभगत पाए जाने पर व्यक्तिगत जिम्मेदारी और आपराधिक कार्रवाई भी शामिल है।
इस पर प्रधान न्यायाधीश ने कहा, ‘नियमों में जवाबदेही का प्रविधान होना चाहिए, अन्यथा हम न्यायिक आदेश के जरिये इसे लागू करेंगे।’पीठ ने सभी अधिकृत वित्तीय संस्थानों की सूची भी मांगी, ताकि उसके निर्देश पूरे क्षेत्र पर लागू किए जा सकें। पीठ ने स्पष्ट किया कि कार्यवाही में हर बैंक को अलग से पक्षकार बनाए बिना भी सभी वित्तीय संस्थानों पर लागू होने वाले निर्देश जारी किए जा सकते हैं।
प्रधान न्यायाधीश ने दो ऐसे क्षेत्रों की पहचान की जिन पर विशेष ध्यान देने की आवश्यकता है- बैंकों की जवाबदेही और साइबर अपराध से हासिल रकम को लेने व आगे भेजने के लिए 'म्यूल अकाउंट्स' का लगातार इस्तेमाल। 'म्यूल अकाउंट्स' का इस्तेमाल जालसाज अलग-अलग खातों के बीच पैसे इधर-उधर करने के लिए करते हैं। इससे रकम का पता लगाना और उसे वापस पाना मुश्किल हो जाता है।
पीठ ने राज्यों व केंद्रशासित प्रदेशों की एजेंसियों को डिजिटल अरेस्ट के मामलों में दर्ज प्राथमिकी व जांच का ब्योरा देने और ऐसे अपराधों की रोकथाम के सुझाव देने का भी निर्देश दिया। वाट्सएप की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल ने अदालत को बताया कि प्लेटफार्म अब तक 9,400 संदिग्ध खातों के विरुद्ध कार्रवाई कर चुका है।
उन्होंने कहा कि कंपनी संदिग्ध खातों की पहचान करने और यूजर्स को सतर्क करने के लिए साफ्टवेयर विकसित कर रही है। सुप्रीम कोर्ट ‘फर्जी दस्तावेजों से जुड़े डिजिटल अरेस्ट के पीड़ितों के संबंध में’ स्वतः संज्ञान लेकर सुनवाई कर रहा है।
सुप्रीम कोर्ट हैरान, पढ़े-लिखे लोग कैसे हो रहे डिजिटल अरेस्ट के शिकार
सुप्रीम कोर्ट ने डिजिटल अरेस्ट के बढ़ते मामलों पर चिंता जताते हुए सवाल किया कि जन जागरूकता अभियान चलाए जाने, समाचार प्रकाशित होने और अदालतों के आदेशों के बावजूद पढ़े-लिखे लोग भी मोबाइल फोन पर गिरफ्तारी के नाम पर ठगी का शिकार कैसे हो रहे हैं।
प्रधान न्यायाधीश सूर्यकांत ने मौखिक टिप्पणी की, 'इन पीड़ितों को क्या हो गया है? वे इस तरह जाल में कैसे फंस रहे हैं? क्या वे इतनी बुनियादी बात भी नहीं समझ सकते? मोबाइल फोन पर गिरफ्तारी का डर कैसा? मोबाइल को दीवार पर मार दीजिए, गिरफ्तारी खत्म हो जाएगी। लोगों के साथ कुछ गड़बड़ है। भगवान जाने क्या है।
लोकतांत्रिक देश में आप किस तरह के व्यक्ति हैं, अगर आपको लगता है कि मोबाइल फोन पर आपकी गिरफ्तारी हो रही है।' उन्होंने कहा, 'हमें यह देखकर निराशा होती है कि पढ़े-लिखे लोग भी ठगी का शिकार हो रहे हैं।
अगर इस उम्र में आप डिजिटल अरेस्ट के शिकार हो रहे हैं, तो अगली पीढ़ी को क्या सिखाएंगे? लोग यह पता लगाने के लिए अदालत की वेबसाइट देख सकते हैं कि गिरफ्तारी का कोई आदेश है या नहीं।'
सोर्स- न्यूज एजेंसी PTI के इनपुट के अनुसार
