[श्यामसुंदर जोशी]। मैदानी इलाकों में मौसम तेजी से गर्म होता जा रहा है। आने वाली छुट्टियों में घूमने जाने की योजनाएं भी बनने लगी हैं। ऐसे मौसम में ज्यादातर लोग पहाड़ों पर जाना पसंद करते हैं। हालांकि आज भी देश में कुछ हिल स्टेशन ऐसे हैं, जिनके बारे में कम लोग ही जानते हैं। इन्हीं में से एक है-महाराष्ट्र के कोंकण अंचल में स्थित छोटा, लेकिन बेहद खूबसूरत शहर सावंतवाड़ी। इसे ‘हिल सिटी’ यानी पर्वतीय नगर भी कहा जाता है। यदि आप प्रकृतिप्रेमी हैं, तो यह जगह आपको बहुत लुभाएगी। इसके आगोश में एक बार आ गए तो इसके मोहपाश में बंधते चले जाएंगे।

दरअसल, यहां कुदरत पूरी तरह मेहरबान है। यहां हर तरफ हरियाली का मंजर है। घने जंगलों से अटे हुए इस इलाके में पहाड़ भी हरे-भरे नजर आते हैं। यह भारत के आधुनिक शहरों से अलग दिखता है, जो हरे-भरे खेतों, आम, खजूर, काजू एवं नारियल के पेड़ों, रंग-बिरंगे फूलों से सज-धजकर आगंतुकों के स्वागत के लिए हमेशा तैयार रहता है।

आधुनिकता व परंपरा का सुंदर समन्वय

सावंतवाड़ी में आप यहां की पारंपरिक विरासत और नैसर्गिक सौंदर्य का शानदार समन्वय देख सकते हैं। सह्याद्रि पर्वत शृंखला में स्थित इस हिल सिटी का भौगोलिक धरातल स्वाभाविक रूप से ऊंचा-नीचा है, इसलिए इसकी बसावट भी आकर्षक है। शहर के बीचोबीच आधुनिक इमारतें भी हैं, पर जब आप यहां के लोगों से मिलेंगे तो उनकी मालवणी और मराठी मिश्रित बोली आपका दिल जीत लेगी। आधुनिक इमारतों वाले घरों में आंगन होता और आंगन में मौजूद होता है एक बेहद कलात्मक कोना। यह स्थान तुलसी के पौधे के लिए है। ऐसा कोना आपको यहां के लगभग हर घर में नजर आएगा। यहां तुलसी पूजन का विशेष महत्व है, जो यहां की संस्कृति को इंगित करता है।

राजवाड़ा पैलेस-अतीत में चहलकदमी

18वीं शती के उत्तरार्ध में खेम सावंत तृतीय ने यहां राजवाड़ा पैलेस का निर्माण कराया था। यदि आप मोती तालाब में बोटिंग करने जाएं तो वहीं से आपको दिख जाएगी यह विशाल इमारत। मोती तालाब के किनारे स्थित होने के कारण इस महल की शोभा में चार चांद लग जाते है। राजवाड़ा पैलेस देखकर राजपरिवार की राजसी जीवनशैली की झलक मिलती है। इस पैलेस का दरबार हॉल, संग्रहालय, प्रदर्शनी कक्ष, फोटो गैलरी, ये सब आपको उस अतीत में वापस ले जा सकते हैं, जब यह राजवाड़ा गुलजार हुआ करता था। यहां आप गंजीफा कार्ड वर्कशॉप और हस्तकला भी देख सकते हैं। पैलेस देखने के लिए 30 रुपये का शुल्क अदा करना होगा।

गंजीफा कला का गढ़

यह शहर गंजीफा कला का प्रमुख केंद्र रहा है। यहां की रानी मां सत्वशिला देवी ने इस कला को खूब प्रोत्साहित किया था। सावंतवाड़ी शाही परिवार के युवराज लखमराजे खेम सांवत भोसले के पास गंजीफा कार्ड के बेहतरीन संग्रह मौजूद हैं। उनके मुताबिक, भारत में यह कला पर्सिया से आई और मुगलकाल में खूब फूलीफली। सावंतवाड़ी में विशेषकर दशावतार गंजीफा कार्ड का प्रचलन रहा है। इनमें भगवान विष्णु के दस अवतारों का प्राकृतिक रंगों से सुंदर चित्रांकन मिलता है। दशावतार गंजीफा में दस सेट होते हैं और प्रत्येक में 12 पत्ते। इस तरह कुल 120 पत्ते होते हैं। इस कार्ड के साथ तीन व्यक्ति एक साथ खेल सकते हैं। ये कार्ड गोलाकार या आयताकार में होते हैं। हालांकि अब यह पारंपरिक कला विलुप्त होती जा रही है।

श्री विट्ठल रुक्मिणी मंदिर

सावंतवाड़ी का एक और मुख्य दर्शनीय स्थल है श्री विट्ठल रुक्मिणी मंदिर। इस मंदिर का शिखर अत्यंत चित्ताकर्षक है, जो करीब 180 फीट ऊंचा है। यहां दिन भर दर्शनार्थियों की भीड़ लगी रहती है। यहां आने वाला प्रत्येक पर्यटक इस मंदिर में दर्शन करने जरूर जाना चाहता है।

शहर की शोभा बढ़ाता है मोती तालाब

मोती तालाब शहर के बीचोबीच स्थित है, जो इसे दो भागों में बांटता है। दोनों को जोड़ने वाली पुलिया के बीच एक प्लेटफॉर्म है, जिस पर वाद्ययंत्र तुताड़ी का मॉडल बना है। यहीं शिवराम राजे भोसले की आदमकद मूर्ति भी है। शाम को रोशनी में दुल्हन की तरह सजा नजर आता है यह तालाब। इससे आसपास का इलाका भी रोशन हो जाता है। मोती तालाब का निर्माण वर्ष 1874 में हुआ था। यहां चारों तरफ सड़कें बनी हैं, जहां टहलने का अलग आनंद है। तालाब में बोटिंग की भी व्यवस्था है। मामूली शुल्क चुकाकर तालाब की सैर कर सकते हैं।

आसपास की यादगार सैर

आह्लादित कर देगा अंबोली

ऊंचे पर्वतों के साए में, गहरी घाटियों की गोद में तथा उड़ते बादलों के आगोश में सिमटा है अंबोली, जो सावंतवाड़ी से तकरीबन 30 किलोमीटर की दूरी पर है। वहां पहुंचने के लिए आपको घने जंगलों के बीच से गुजरना होगा। घाटी से होकर पहाड़ी की चढ़ाई करते हुए जैसे ही यहां पहुंचेंगे, आह्लादित हो उठेंगे। यहां दो प्वाइंट्स हैं, जो पर्यटकों को खूब लुभाते हैं। एक है कावलासेट और दूसरा, महादेवगढ़ प्वाइंट। मानसून के दौरान यहां की रौनक अधिक बढ़ जाती है। यहां कई रमणीक झरने भी हैं, जिनमें धबधबा जलप्रपात इतना खूबसूरत है कि वहां पहुंचने के बाद आपका लौटने का मन ही नहीं करेगा।

समुद्री बीच का भी आनंद

दिलचस्प यह है कि सावंतवाड़ी से गोवा केवल 40 किमी. की दूरी पर है। यदि आप बीच की सैर के शौकीन हैं तो सावंतवाड़ी के निकट ही स्थित है शिरोड़ा एवं रेडी बीच, जो गोवा के समुद्री तटों जैसे ही हैं। ये बीच सावंतवाड़ी से महज 25-30 किलोमीटर की दूरी पर हैं। यहां तक पहुंचने का रास्ता भी बड़ा आकर्षक है। हर तरफ हरे-भरे खेत, नारियल और सुपारी के पेड़ व फलों के बगीचे नजर आते हैं। इसके पास ही मालवन, तरकरली और देव बाग जैसे समुद्री तट भी हैं।

बापूसा खेम सावंत के सम्मान में पड़ा नाम

यह शहर सावंतवाड़ी नाम के रजवाड़े की राजधानी रहा है, जिसका शासन मराठों के सावंत भोसले शाही वंश के हाथों में था। शहर की स्थापना महाराजा बापू साहब खेम सावंत के समय में हुई थी, जो बापूसा महाराज के नाम से लोकप्रिय थे। उन्हीं के सम्मान में इसका नाम सावंतवाड़ी रखा गया।

नरेंद्र पर्वत से शहर का विहंगम नजारा

घने जंगलों से आच्छादित यहां के नरेंद्र पर्वत पर आप पहुंचे तो यहां घंटों कैसे बीत जाएंगे, पता भी नहीं चलेगा। बारिश के दिनों में तो यह पूरा इलाका दिलकश नजारों से भर जाता है। इस पर्वत पर ही नरेंद्र उद्यान बना हुआ है। यहां से आप शहर का विहंगम दृश्य देख सकते हैं। यहीं पर हनुमान मंदिर भी है। सबसे अच्छी बात यह है कि ऊपर तक जाने के लिए आपको बिल्कुल पक्की सड़क मिलेगी।

शिल्पग्राम में पाएं सेहत लाभ भी!

सावंतवाड़ी में महाराष्ट्र पर्यटन विकास निगम तथा सावंतवाड़ी म्युनिसिपल काउंसिल द्वारा आर्ट ऐंड क्राफ्ट विलेज ’शिल्पग्राम’ का निर्माण कराया गया है। यहां आप स्थानीय हस्तशिल्प, लोक कला एवं ग्रामीण जन-जीवन की झांकी देख सकते हैं। यहां आसपास कृत्रिम झील, झरना और फुलवारी देखकर बड़ा आनंद आएगा। यहां कुछ कॉटेज भी तैयार किए गए हैं। आप चाहें तो यहां विश्राम भी कर सकते हैं। एक और खास बात यह है कि इस शिल्पग्राम के एक हिस्से में आयुर्वेदिक एवं प्राकृतिक चिकित्सा केंद्र भी चलता है। सेहत संबंधी कोई परेशानी है तो यहां परामर्श भी ले सकते हैं।

खिलौना मार्केट से करें खरीदारी

सावंतवाड़ी की एक और खासियत है यहां मिलने वाले लकड़ी के खूबसूरत खिलौने। दरअसल, यह व्यवसाय यहां सैकड़ों वर्षों से चल रहा है। यहां के लोग अपनी इस परंपरा को आज भी बरकरार रखे हुए हैं। यदि आप यहां से खिलौने ले जाना चाहते हैं तो इसके लिए उभा बाजार काफी मशहूर है। दरअसल, यह पूरी तरह खिलौना मार्केट ही है। यहां बने लकड़ी के ये खिलौने दूर-दूर तक बिक्री के लिए जाते हैं। पहले ये घरों में ही बनाए जाते थे, पर अब लोगों ने कुछ फैक्ट्रियां भी लगा ली हैं। आसपास के जंगलों से लकड़ी लेकर बनाए गए इन खिलौनों पर आकर्षक पॉलिशिंग होती है। फलों की टोकरियों वाले ये खिलौने पर्यटकों को खूब पसंद आते हैं। इसके अलावा, आप यहां से कोंकणी हस्तशिल्प भी खरीद सकते हैं। यहां रघुनाथ मार्केट में कोंकणी हस्तशिल्प की वस्तुएं आराम से मिल जाती हैं। यह बाजार 150 साल पुराना है, जहां अब आधुनिक दुकानें भी खुल रही हैं।

मसालेदार मालवणी भोजन के चटखारे

कोंकण के शाकाहारी एवं मांसाहारी व्यंजनों का स्वाद आपको यहां भी मिलेगा। यह है मालवणी जायका, जो महाराष्ट्र और गोवा में खूब मिलता है। चूंकि यह तटीय क्षेत्र है, इसलिए सी-फूड यहां के लोगों का प्रिय भोजन है। मालवणी स्वाद में कोकोनट, इमली, कोकम तथा कच्चे आम का प्रयोग मुख्य रूप से किया जाता है। इनके अलावा, आप यहां कोकम शर्बत का भी आनंद ले सकते हैं, जिसे यहां वेलकम ड्रिंक माना जाता है। दरअसल, कोकम रसभरे बेर की तरह होता है। यह ज्यादातर गोवा में होता है।

शाकाहार में भाकरी रोटी, स्टीम्ड राइस, तीखी, मसालेदार और खुशबूदार सोल कढ़ी, दाल करी तथा उसल का स्वाद आपको खूब भाएगा। वहीं मांसाहारियों के लिए मालवणी फिश लज्जतदार होती है। इसे मसाला करी के साथ खस्ता या करारी फ्राई करके खाना भी खूब पसंद किया जाता है। ताजी मछली पर सूजी और चावल के आटे का लेप करके और मसाला डालकर फ्राई करके खाने को यहां के लोग खूब पसंद करते हैं।

कैसे और कब जाएं?

सावंतवाड़ी मुंबई से गोवा को जोड़ने वाले राष्ट्रीय राजमार्ग संख्या 66 पर स्थित है। यह सिंधुदुर्ग जिले के अन्य कस्बों व महाराष्ट्र के विभिन्न शहरों से महाराष्ट्र राज्य पथ परिवहन निगम की बस सुविधा से जुड़ा हुआ है। गोवा (40 किलोमीटर), कोल्हापुर (150 किलोमीटर) और बेलगांव (80 किलोमीटर) से भी यहां के लिए सीधी बस सेवा उपलब्ध है। अगर आप रेलमार्ग से पहुंचना चाहते हैं तो मुंबई से गोवा कोंकण रेलवे लाइन सावंतवाड़ी होकर निकलती है। स्टेशन का नाम सावंतवाड़ी रोड है, जो शहर से 8 किलोमीटर दूर है। निकटतम एयरपोर्ट डेबोलिन (गोवा) में है। यहां आप कभी भी, किसी भी मौसम में जा सकते हैं। हालांकि मानसून के दौरान इसकी सुंदरता देखते ही बनती है।

Posted By: Sanjay Pokhriyal

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