अनूप शुक्‍ला। होली की शुरुआत लफड़े से हुई। बरामदे में बैठे चाय पी रहे थे। अंदर लैंडलाइन फोन बजा। उठाने गए तब तक कॉल कट गया। शायद किसी ने ‘हैप्पी होली’ बोलने के लिए फोनियाया होगा। वापस लौटे तब तक हमारे घर में सर्जिकल स्ट्राइक हो गई थी। चाय का कप, पानी का गिलास, बिस्कुट का पैकेट सब उलट-पुलट और लुट गए थे। ताजे अखबार के हाल बमबारी में छत-विक्षत नगर सरीखे थे।

हमने एक बार फिर खुद को बरामदा खुला छोड़ने के लिए कोसा। बंदरों की कड़ी निंदा करने का निर्णय लिया। हर चीज की तस्वीर खींचने की परंपरा का पालन करने के लिए हमने इस दुर्घटना को मोबाइल में कैद करने के लिए घुटन्ने की जेब में हाथ डाला तो मोबाइल नदारद पाया। दूसरी जेब टटोली। वहां से भी गायब। हमारे तो तोते ही उड़ गए। जल्दी-जल्दी, बारी-बारी से अपनी दोनों जेबों में जांच की। तेजी के चक्कर में हथेली गर्मा गई लेकिन मोबाइल न मिला।

इस बीच लगा शायद मोबाइल अंदर ले गए हों। इस ख्याल से सुकून मिलने के पहले ही सामने पड़ा मोबाइल कवर दिख गया। लुटा-पिटा कवर मोबाइल के अपहरण की कहानी बता रहा था। मासूम मोबाइल बंदरों के हाथ लग गया था। बेचारा मोबाइल न कहीं आया था, न कहीं गया था। हाथ से जेब, जेब से मेज, मेज से हाथ तक ही आनाजाना था। इसके अलावा चार्जिंग के लिए बिजली के स्विच तक जाने का ही अनुभव था। सर्विस सेंटर तक का मुंह नहीं देखा था अब तक। ऐसे मासूम मोबाइल को बंदर उठा ले गए। न जाने क्या बदसलूकी की होगी बेचारे के साथ।

इस बीच अपन का उड़ा हुआ होश वापस आ गया। हमने अपहृत मोबाइल को वापस हासिल करने की कोशिश शुरू की। बंदर छत पर से होते हुए दीवार फांदकर बगल के मैदान में शायद हमारे मोबाइल का अपहरण सेलिब्रेट कर रहे थे। हम मैदान तक पहुंचने के लिए सड़क की ओर भागे। भागते समय सांसों ने उखड़ते हुए सीने से समर्थन वापसी की धमकी दी। हम धीमे हो गए। भागने की जगह लपकने लगे। रास्ते के कुत्ते भी हमारे साथ हो लिए। कुछ पीछे से भौंक-भौंककर हमारी गति बढ़ाने की कोशिश कर रहे थे। मन किया कुत्तों से ही पूछें, ‘भाई साहब क्या आपने किसी बंदर को हमारा मोबाइल ले जाते देखा?’ लेकिन भाषाई अड़चन के चलते पूछ नहीं पाए।

हम मैदान के गेट तक पहुंच गए। सोचा अंदर ‘बंदर वाटिका’ में मोबाइल खोजेंगे लेकिन गेट पर बड़ा सा ताला लगा था। मैदान खुला नहीं था। हम उल्टे पांव वापस लौटे। दूसरे रास्ते से मैदान जाने की सोची। लौटते हुए जितनी तेजी से पैर चल रहे थे उससे कई गुना तेजी से दिमाग भाग रहा था। सोचने लगे कि जिस बंदर के हाथ मोबाइल पड़ा क्या पता वह किसी को फोन मिलाकर खौखियाते हुए बतिया रहा हो और उधर से हमारे दोस्त/ सहेली मेरा नाम लेकर हड़का रहा हो कि यह क्या बंदरों जैसी हरकतें कर रहे हो। इस पर वह और बंदरपने पर उतर आया होगा और जोर से खौखियाने लगा हो। किसी को सेल्फी भेज दी हो। एक के संदेश दूसरे को फॉरवर्ड कर दिए हों।

हमने मन को समझाने की बहुत कोशिश की। मोबाइल बंदर ले गया है कोई आदमी थोड़ी ले गया जो इतना हलकान हो रहे हो लेकिन मन नहीं माना। उसने दिल से गठबंधन कर लिया। दोनों मिलकर तेज-तेज धड़कने लगे। देखा-देखी टांगे भी तेज चलने लगीं। हम स्कूल की दीवार फांदकर मैदान के पास पहुंचे। वहां बंदर आम सभा टाइप करते हुए धूप सेंक रहे थे। कुछ बंदरियां एक-दूसरे के जुंए बीन रहीं थीं। कुछ अपने सीने से बच्चों को सटाए दुलरा रही थीं। कुछ बंदर लोग आस-पास से उठाकर लाई हुईं चीजें कुतर-कुतरकर फेंकते जा रहे थे। बंदर और बंदरिया बैठे थे लेकिन मजाल कोई किसी को छेड़ता दिखा हो। न ही कोई बंदर किसी बंदरिया को घूरता दिखा।

इस बीच अपन एक दूसरे मोबाइल से अपने मोबाइल पर घंटी बजाते जा रहे थे। यह सोचते हुए कि जैसे ही कोई बंदर- ‘हल्लो, हू इज स्पीकिंग?’ बोलेगा हम उससे फौरन कहेंगे, ’भाई साहब, हमारा मोबाइल वापस कर दो। इकलौता मोबाइल है मेरा। जो कहोगे फिरौती देने के लिए तैयार हैं।’ हमको यह भी लगा कि क्या पता मोबाइल बजने से बंदर का हाथ झनझना जाए और वह मोबाइल छोड़ दे फिर ख्याल आया कि कहीं मोबाइल छोड़ते समय वह किसी ऊंची जगह बैठा न हो जिससे नीचे आने तक मेरे मोबाइल की हड्डी-पसली बराबर हो जाए।

मैदान पहुंचकर हमने घास, झाड़ियां, नालियां सब देख डालीं। कहीं मोबाइल न दिखा। हमने सोचा अंतत: निराश होने का समय हो गया। तब तक सूरज भाई दिख गए। उन्होंने हमारे चेहरे की पसीने की बूंदों पर गुलाल की तरह किरणें पोत दीं। इसके बाद हम कुछ कहें तब तक बगल की नाली की तरफ किरणों की सर्चलाइट फेंकी। देखा कि वहां हमारा मोबाइल किसी शराबी सरीखा कीचड़ में पड़ा था। हमने लपककर अपने मोबाइल को उठाया। प्यार के अतिरेक में मोबाइल को चूमने के लिये मुंह आगे बढ़ाया लेकिन स्क्रीन पर कीचड़ लिपटा देखकर ठिठक गए। पहले मैदान की घास में कीचड़ पोंछा, फिर कागज से उसे साफ किया। इसके बाद बरमूडा की जेब से रगड़कर उसकी रंगत वापस लाने का प्रयास किया। इस बीच मोबाइल चूमने का ख्याल हवा हो गया।

मोबाइल वापस लेकर विजयदर्प में चूर घर लौटे। लौटते हुए अपनी अकल की दाद देने की बेवकूफी करते रहे। बंदरों ने सुबह-सुबह हलकान कर दिया था। हमको उन पर बहुत तेज गुस्सा आ रहा था। उसी समय यह भी लगा कि क्या पता मोबाइल ले जाने वाला बंदर न होकर कोई बंदरिया रही होगी। सोचते ही हमारा गुस्सा कुछ कम हो गया। हम उनके खिलाफ एक्शन लेने की सोच ही रहे थे तब तक सामने वाली टीन की छत पर धमाचौकड़ी करते हुए बंदर दिखे। हमने मारे गुस्से के उन पर ढेले की मिसाइल फेकने के लिए हाथ में ले ली। तब तक एक बंदर ने दांत चियारते हुए हमको वापस घुड़क दिया। शायद कह रहा था- ‘बुरा न मानो होली है।’

Posted By: Kamal Verma

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