'भारत को दूसरा चीन नहीं बनने देगा अमेरिका', रूसी राजदूत का बड़ा दावा
रूसी राजदूत डेनिस अलिपोव ने दावा किया है कि एक अमेरिकी अधिकारी ने सार्वजनिक रूप से स्वीकार किया था कि ...और पढ़ें

भारत में रूस के राजदूत डेनिस अलिपोव(फोटो: एएनआई)

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डिजिटल डेस्क, नई दिल्ली। वैश्विक राजनीति में बढ़ते तनाव और रणनीतिक खींचतान के बीच भारत में रूस के राजदूत डेनिस अलिपोव दावा किया है कि एक वरिष्ठ अमेरिकी अधिकारी ने सार्वजनिक रूप से स्वीकार किया था कि वाशिंगटन भारत को प्रतिस्पर्धी के रूप में दूसरा चीन नहीं बनने देगा।
एक निजी न्यूज चैनल के डिस्कशन कार्यक्रम में रूसी राजदूत ने इस बयान को अमेरिका के मुंह से अनजाने में निकली सच बात यानी फ्रोएडियन स्लिप करार देते हुए चेतावनी दी कि जैसे-जैसे भारत महाशक्ति बनने की ओर बढ़ेगा, अमेरिका उसे रोकने के लिए अपने दबाव की रणनीति को और तेज करेगा।
भारत पर बनाया जा रहा दबाव?
यह टिप्पणी इस साल आयोजित रायसीना डायलॉग के दौरान एक शीर्ष अमेरिकी अधिकारी ने की थी। अलिपोव ने कहा कि भारत का एक वैश्विक महाशक्ति के रूप में उभरना तय है, और यही बात वाशिंगटन को रास नहीं आ रही है।
उनके मुताबिक, अमेरिका द्वारा भारत पर बनाया जा रहा दबाव कोई अनहोनी बात नहीं है, बल्कि यह भारत के बढ़ते प्रभाव को रोकने की एक सोची-समझी रणनीति का हिस्सा है।
ग्रैहम एक्ट, तेल खरीद और भारत की रणनीतिक स्वायत्तता
रूसी राजदूत ने अमेरिका के हालिया ग्रैहम एक्ट का हवाला देते हुए इसे भारत पर दबाव बनाने का नया जरिया बताया। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रंप द्वारा हस्ताक्षरित इस कानून के तहत रूस और ईरान पर आर्थिक शिकंजा कसने के लिए, उनसे तेल और गैस खरीदने वाले देशों पर 100 प्रतिशत तक का भारी-भरकम टैरिफ लगाने का प्रावधान है।
भारत द्वारा रूसी तेल की खरीद पर उठ रहे सवालों का जवाब देते हुए अलिपोव ने कहा कि भारत रूस के फायदे के लिए नहीं, बल्कि अपनी अर्थव्यवस्था और अपनी जनता के हित में प्रतिस्पर्धी दरों पर तेल खरीद रहा है।
उन्होंने आगे कहा कि अमेरिका के इस बेतुके रुख और दबाव के बावजूद भारत ने अपनी मजबूत रणनीतिक स्वायत्तता का परिचय दिया है, जो उसकी संप्रभुता को दर्शाता है।
80 साल पुरानी ऐतिहासिक साझेदारी
भारत और सोवियत संघ/रूस के बीच अप्रैल 1947 से चले आ रहे राजनयिक संबंधों का जिक्र करते हुए अलिपोव ने कहा कि दोनों देशों का रिश्ता केवल तात्कालिक वैश्विक लाभ-हानि पर आधारित नहीं रहा है।
विदेश मंत्री एस. जयशंकर के बयान को याद करते हुए उन्होंने कहा कि दोनों देशों की साझेदारी में हमेशा एक निरंतरता रही है। अगले साल भारत और रूस अपने राजनयिक संबंधों की 80वीं वर्षगांठ मनाने जा रहे हैं, और यह ऐतिहासिक रिश्ता आपसी विश्वास और सम्मान की मजबूत बुनियाद पर टिका हुआ है।
भारत और रूस के पास बेहद ठोस एजेंडा
हाल ही में 11 सितंबर को नई दिल्ली में ब्रिक्स शिखर सम्मेलन के दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन के बीच द्विपक्षीय वार्ता हुई थी। अलिपोव ने कहा कि इस मुलाकात ने साफ कर दिया कि दोनों देशों के पास भविष्य का एक बेहद मजबूत और ठोस एजेंडा है।
उन्होंने जोर देकर कहा कि ब्रिक्स केवल भारत और रूस के लिए ही नहीं, बल्कि दुनिया के तमाम विकासशील देशों के लिए एक निष्पक्ष, खुला और समावेशी मंच बनकर उभरा है, जहां हर देश को वैश्विक फैसलों में बराबरी की आवाज मिलती है।
