मुंबई (दीपा अशोक पवार)। फाउंडिंग ट्रस्टी-अनुभूति संगठन किशोरावस्था एक ऐसा समय है जहां बच्चे बाल्यावस्था से युवावस्था की तरफ बढ़ते हैं। यह एक ऐसी अवधि है जहां वे तमाम अनुभवों से दो-चार होते है। इस अवस्था में शरीर में होने वाले बदलावों से जुड़े कई सवाल उनके मन में उठते हैं। इसी बिंदु पर एक बड़ा सवाल उठता है कि क्या हम सच में इस आनंददायक और रोचक अवस्था को समझ पाते हैं? ‘हम’ से मतलब सिर्फ परिवार या स्कूल ही नहीं हैं, सरकारी योजनाएं, हमारे समाज की मन:स्थिति भी इसमें शामिल हैं।

इसी संदर्भ में बच्चियों की बात करें तो 9-12 साल की उम्र में लड़कियां तमाम शारीरिक परिवर्तनों से गुजरती हैं और इसमें मासिक धर्म सबसे महत्वपूर्ण बदलाव है। विज्ञान मासिक धर्म को एक सर्वव्यापी प्राकृतिक विकास कहता है जो हर लड़की के जीवन में होता है। इससे जुड़ा इतन साधारण सच भी हमारे समाज में स्वीकृत नहीं है। जिस प्रकार लड़कियों में शारीरिक बदलाव आते हैं उसी तरह लड़कों में भी कई तरह के शारीरिक बदलाव आते हैं। परंतु दोनों के बदलावों को समाज में बहुत अलग ढंग से देखा जाता है। अगर एक लड़के को शेविंग रेजर लेने दुकान जाना पड़ता है तो वह बड़ी आसानी से खरीद लेता है परंतु अगर एक लड़की सेनेटरी नैपकिन लेने जाती है, तो दुकानदार गोपनीय तरीके से सेनेटरी नैपकिन के पैकेट को अखबार में लपेटकर काले रंग की एक थैली में देता है और लड़की भी उसे चुपके से ले लेती है।

यह केवल परंपरागत रूप से मासिक धर्म से जुड़ी शर्म का परिणाम है और यह हमारे समाज में सदियों से चला आ रहा है। कई लड़कियों के जीवन में मासिक धर्म आतंक और भयावहता के साथ आता है। परिवारवाले और आस-पास के लोग बच्चियों पर नियंत्रण और कड़ी निगरानी बरतनी शुरू कर देते हैं। हर मनुष्य में प्यार, घृणा, ईर्ष्या, भय, शर्म, क्रोध इत्यादि प्राकृतिक भावनाएं होती हैं परंतु समाज में लड़कियों को शर्मीली और लड़कों को उग्र स्वरूप में ही स्वीकार किया जाता है। हम दैनिक जीवन में कई बार इस तरह के नियमों का पालन व विशेषणों का प्रयोग करते हैं। मर्द और औरत को कैसे व्यवहार करना चाहिए, ऐसा यही सामाजिक विभाजन तय करता है। यह भेदभाव हमारे समाज में काफी सालों से हैं। जैसे ही एक लड़की की माहवारी शुरू होती है, कई तरह के नियंत्रण लगने शुरू हो जाते हैं। लड़कियों को घर पर सिखाया जाता है कि कैसे वो बोलने-हंसने आदि सामान्य क्रियाओं पर नियंत्रण रखें। उन्हें कई किस्म की बेबुनियाद मान्यताओं को मानने पर मजबूर कर दिया जाता है।

विडंबना यह है कि शिक्षा प्रणाली भी किसी व्यक्ति के शारीरिक विकास के दौरान होने वाले परिवर्तनों के बारे में खुले तौर पर बोलने में विफल दिखती है। आज भी स्कूलों में यौन शिक्षा की अवधारणा अभी तक स्वीकृत नहीं है। शायद ही कोई अच्छा परामर्श कार्यक्रम मौजूद हो जहां लड़कियां मासिक धर्म और किशोरावस्था से जुड़े सवाल पूछ सकती हों। ऐसी स्थिति में उन्हें घर या स्कूल कहीं से समाधान नहीं मिलते हैं। किशोरावस्था में आते ही अधिकांश गांवों-कस्बों की लड़कियां भारतीय संविधान के तहत मिले ‘शिक्षा का अधिकार’ से पूरी तरह वंचित हो जाती हैं। विद्यालयों में शौचालय की व्यवस्था नहीं होती है, ऐसे में वे स्कूल छोड़ने पर मजबूर हो जाती हैं। भारतीय संविधान में प्रत्येक नागरिक को उसके जन्म से कुछ मौलिक अधिकार मिले हैं। पर क्या मासिक धर्म से जुड़े मिथकों की वजह से एक लड़की वाकई अपने मौलिक हक, न्याय और आजादी के अधिकारों का इस्तेमाल कर पाती है?

इसके अलावा भी हमारे समाज में मासिक धर्म के संबंध में कई गलत धारणाएं बनाई गई हैं। लड़कियों को यह विश्वास दिलाया जाता है कि वे धार्मिक किताबें नहीं छू सकतीं। पूजास्थलों पर उनका प्रवेश वर्जित हो जाता है। यहां तक कि रसोई और खाने-पीने की चीजों को लेकर भी इसी तरह के नियम बनाए गए हैं। कानून छुआछूत और उससे संबंधी व्यवहार को अपराध मानता है लेकिन मासिक धर्म के दौरान लड़कियों और महिलाओं के साथ भी तो एक तरह से छुआछूत जैसा बर्ताव ही तो किया जाता है। तो क्या इस तरह का बर्ताव हमारे संविधान का, कानून के राज्य का तिरस्कार नहीं करता? यह दुखद है कि हमने ऐसी स्थिति बनाई है कि लड़कियों को पुरुषों से मासिक धर्म से संबंधित कोई भी जानकारी साझा करने की सहज भावना नहीं दी है। यह स्थिति लड़कियों की आत्म-अभिव्यक्ति और वैयक्तिक रूप में अपनी भूमिका को पूरा करने पर गहरा नकारात्मक प्रभाव डालती है। माहौल ऐसा बना हुआ है कि मासिक धर्म को प्राकृतिक विकास कम और अपराध ज्यादा माना जाता है।

ऐसे में जरूरी है कि माता-पिता और स्कूल के शिक्षक इस पर किशोर-किशोरियों के साथ सहज ढंग से चर्चा करें। इस आयुवर्ग के मन में जो भी सवाल हैं, उनके जवाब देने का प्रयास शिक्षा के माध्यम से करना चाहिए और लड़कियों के लिए परामर्श का पथ खुला रखना चाहिए। धीरे-धीरे बदलाव शुरु हो भी रहा है। कई ऐसे स्कूल हैं जहां मासिक धर्म से जुड़ी जानकारी देने के लिए सत्र आयोजित किए जाते हैं। पर यह पहल सागर में बूंद भर है। आवश्यक है कि गहरी जड़ें ले चुकीं परंपराओं और अनुष्ठानों का अध्ययन वैज्ञानिक विचारों और विश्लेषण के माध्यम से किया जाए। एक समाज के रूप में हमारा यह कर्तव्य है कि इस चुप्पी को तोड़ें। इतिहास गवाह है कि भारतीय संस्कृति ने निश्चित रूप से महिलाओं की शारीरिक क्षमताओं में गर्व महसूस किया है, तो फिर हम इससे दूर क्यों चले गए हैं? चुप्पी तोड़िए, आइए बात करें। परिवर्तन की पहल में भागीदार बनें।

मासिक धर्म और इसके प्रभाव के दौरान लड़कियों पर धार्मिक और सांस्कृतिक प्रतिबंध’ पर लिखे शोध पत्र की प्रक्रिया के दौरान कुछ महत्वपूर्ण आंकड़े नजर आए। इस शोध के अनुसार-

-75 प्रतिशत लड़कियां मासिक धर्म होना शर्मिंदगी की बात मानती हैं।

-मासिक धर्म के दौरान, 72 प्रतिशत लड़कियां कपडे़ का इस्तेमाल करती हैं तो वहीं सिर्फ 27 प्रतिशत लड़कियां ही खुद सैनेटरी नैपकिन खरीदकर लाती हैं।

-43 प्रतिशत लड़कियों ने माना कि मासिक धर्म शुरू होने से पहले उन्हें इसके बारे में कोई जानकारी नहीं थी।

-7 प्रतिशत लड़कियों ने माना कि उन्हें मासिक धर्म पर चर्चा की मनाही है।

-83 प्रतिशत लड़कियों का अनुभव रहा है कि यौवनारंभ होते ही उन पर घर के काम की जिम्मेदारी बढ़ गई।

-तकरीबन 72 प्रतिशत लड़कियों ने मासिक धर्म शुरू होने की बात अपनी मां को, 27 प्रतिशत लड़कियों ने दोस्तों और शिक्षकों को और 1 प्रतिशत लड़कियों ने अपने भाइयों और पिता को बताई।

By Srishti Verma