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भारत में प्रदर्शन पर यूएन की आलोचना को रूबियो ने किया खारिज, बोले- यह आंतरिक राजनीतिक मामला

By Jayprakash RanjanEdited By: Deepak Gupta
Published: Wed, 21 Oct 2026 08:34 PM (IST)

अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रूबियो ने भारत में चल रहे छात्र विरोध प्रदर्शनों पर यूएन विशेषज्ञों की टिप्पणी को खारिज किया, इसे भारत का आंतरिक राजनीतिक मामला बताया।

भारत में प्रदर्शन पर यूएन की आलोचना को रूबियो ने किया खारिज। (रॉयटर्स)

भारत में प्रदर्शन पर यूएन की आलोचना को रूबियो ने किया खारिज। (रॉयटर्स)

HighLights

  1. अमेरिकी विदेश मंत्री रूबियो ने यूएन विशेषज्ञों की टिप्पणी को खारिज किया।

  2. भारत के छात्र विरोध प्रदर्शनों को आंतरिक राजनीतिक मामला बताया।

  3. यूएन के दोहरे मानदंड पर भी सवाल उठाए गए, भारत का समर्थन।

जयप्रकाश रंजन, जागरण। अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रूबियो ने भारत में चल रहे छात्र और युवा विरोध प्रदर्शनों को लेकर यूएन स्पेशल रैपोर्टर (विशेष प्रतिनिधि) व अन्य विशेषज्ञों की टिप्पणियों पर तीखी प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि “यूएन एक्सपर्ट्स” शब्द ही एक आक्सीमोरन (विरोधाभासी) है।

भारत यात्रा के दौरान एक मीडिया चैनल से बात करते हुए जब उनसे इस मुद्दे पर पूछा गया, तो उक्त टिप्पणी की और साथ ही स्पष्ट किया कि ‘यह भारत का आंतरिक राजनीतिक मामला है।

दूसरे देश के घरेलू मामलों पर टिप्पणी नहीं करेंगे- रूबियो

उन्होंने कहा कि भारत एक लोकतंत्र है, यहां चुनाव होते हैं और अमेरिका में भी रोजाना प्रदर्शन होते रहते हैं इसलिए वे किसी दूसरे देश के घरेलू मामलों पर टिप्पणी नहीं करेंगे। रूबियो की ओर से वही दोहराया गया है जो भारत कहता रहा है और ऐसे मौके पर सीधे तौर पर भारत के समर्थन में है जब अमेरिका का हित भारत में है।

यह मामला इसलिए महत्वपूर्ण है कि एक दिन पहले ही यूएन के 20 से अधिक स्वतंत्र मानव अधिकार विशेषज्ञों (स्पेशल रैपोर्टर्स सहित) ने एक संयुक्त बयान जारी कर भारत में पिछले कुछ महीनों से जारी विरोध प्रदर्शनों पर पुलिस की “बार-बार भारी-भरकम प्रतिक्रिया” पर चिंता जताई है।

भारत ने यूएन के बयानों को अवांछित हस्तक्षेप करार दिया

भारत की ओर से इन टिप्पणियों को लगातार एकतरफा, पक्षपातपूर्ण और असत्यापित बताया गया है। विदेश मंत्रालय और भारतीय प्रतिनिधिमंडलों ने पहले भी यूएन के बयानों को अवांछित हस्तक्षेप और सुनी-सुनाई बातों पर आधारित करार दिया है।

कुछ भारतीय राजनयिकों ने सोशल मीडिया पर यह कहा है कि मानवाधिकार को राजनीतिक दबाव या किसी देश को चुनिंदा रूप से निशाना बनाने का औजार नहीं बनाया जाना चाहिए। साथ ही यूएन का इस मामले में दोहरा रवैया भी स्पष्ट नजर आता है।

यूरोप में फ्रांस, इटली, बेल्जियम, पुर्तगाल और अल्बानिया समेत कई देशों में लागत-जीवन, आवास और शिक्षा को लेकर बड़े पैमाने पर प्रदर्शन चल रहे हैं, जहां दंगे, आगजनी, लूटपाट और हजारों गिरफ्तारियां हुई हैं। पुलिस ने टियर गैस, वॉटर कैनन और अन्य बल का इस्तेमाल किया।

यूएन मानवाधिकार प्रमुख वोल्कर तुर्क ने 20 अक्टूबर को यूरोप के प्रदर्शनों पर बयान जारी कर हिंसा की निंदा की और दोनों पक्षों से संवाद की अपील की, लेकिन भारत के मामले में विशेषज्ञों का सामूहिक आलोचना का स्वर काफी आक्रामक रहा है। भारत पहले भी पड़ोस और यूरोप (जैसे फ्रांस) में प्रदर्शनों पर यूएन की चुप्पी या नरम प्रतिक्रिया को दोहरे मानदंड का उदाहरण बता चुका है।