हैदराबाद, आइएएनएस। राष्ट्रीय अनुसूचित जाति आयोग (एनसीएससी) ने अपनी जांच में पाया है कि हैदराबाद यूनिवर्सिटी के छात्र रोहित वेमुला ने भेदभाव के कारण ही आत्महत्या की थी। यही वजह है कि आयोग शैक्षणिक संस्थानों में भेदभाव और अत्याचार रोकने के लिए अलग कानून चाहता है।

अनुसूचित जाति आयोग ने जांच में पाया कि पीएचडी का छात्र रोहित दलित था। विश्वविद्यालय व हॉस्टल से निलंबन और फेलोशिप रोकने जैसे भेदभाव वाले बर्ताव के कारण वह मानसिक रूप से परेशान था। पीएल पूनिया की अध्यक्षता वाले आयोग ने कहा है कि रोहित द्वारा विश्वविद्यालय प्रशासन को लिखे गए पत्रों से पता चलता है कि वह मानसिक यंत्रणा झेल रहा था। अपने पत्रों में उसने दलित छात्रों को जहर खाने या फांसी लगाकर आत्महत्या करने की सलाह दी थी। सुसाइड नोट में उसने अपने जन्म को एक जानलेवा दुर्घटना बताया था।

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आयोग ने यह रिपोर्ट 22 जून को ही दे दी थी, लेकिन इसे अब सार्वजनिक किया गया है। इसमें कहा गया है कि विश्वविद्यालय प्रशासन ने रोहित की परेशानी खत्म करने के लिए कुछ नहीं किया। विश्वविद्यालय प्रशासन, मानव संसाधन विकास मंत्रालय को इस दुखद घटना के लिए जिम्मेदार सभी परिस्थितियों की जांच करनी चाहिए। साथ ही सुनिश्चित करना चाहिए कि अनुसूचित जाति के छात्रों के साथ भेदभाव न हो और विश्वविद्यालय में उन्हें पूरी तरह से स्वीकार किया जाए। ऐसा देश के सभी विश्वविद्यालयों में होना चाहिए।

आयोग ने साइबराबाद पुलिस को इस मामले की जांच जल्द पूरी कर कोर्ट में रिपोर्ट दाखिल करने की सलाह भी दी है। आयोग ने गुंटूर जिला प्रशासन को रोहित की मां को अभी 4,12,500 रुपये सहायतार्थ देने और पुलिस द्वारा आरोपपत्र दाखिल करने के बाद इतनी ही राशि और देने के लिए कहा है।

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Posted By: Sanjeev Tiwari

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