नई दिल्ली, जेएनएन। आठ मिलियन टन प्लास्टिक दुनियाभर के समुद्रों में हर साल पहुंचता है, लेकिन क्या आप जानते हैं कि यह प्लास्टिक कहां से आता है। समुद्रों में प्लास्टिक हवा, नालियों या अवैध तरीकों से डंप किए जाने की वजह से आता है। समुद्रों तक प्लास्टिक पहुंचाने के मामले में नदियां सबसे अधिक दोषी हैं। पर चौंकाने वाली बात यह है कि दुनियाभर के समुद्रों में नब्बे फीसदी से अधिक प्लास्टिक दस बड़ी नदियों से ही पहुंचता है।

एक्सपोर्ट ऑफ प्लास्टिक डिबरिस बाय रिवर्स इनटू द सी रिपोर्ट के अनुसार, एशिया की कुछ प्रदूषित नदियां समुद्र को प्लास्टिक कचड़े से भर रही हैं। इस रिपोर्ट और शोध के अनुसार, चीन चांग जियांग या यांगेज नदी इस मामले में सबसे अधिक दोषी है। यह समुद्र में प्रति वर्ष 1.47 मिलियन टन प्लास्टिक पहुंचाती है। इसके कारण चाइनीज घड़ियाल के अस्तित्व पर खतरा आ गया था। इसके कारण बाईजी या चाइनीज रिवर डालफिन के अस्तित्व पर भी खतरा मंडराने लगा था। इसी वजह से पहली डालफिन मानव गतिविधि की वजह से करीब-करीब गुप्त होने के कगार पर आ गई थी।

चीन, भारत और पाकिस्तान से बहने वाली सिंधू नदी भी सबसे प्रदूषित नदी मानी गई है। यह समुद्रों में 164,000 टन प्लास्टिक कचड़ा हर साल ले जाती है। वहीं चीन की दूसरी सबसे बड़ी नदी येलो भी काफी प्लास्टिक कचड़ा समुद्र में ले जाती है। इससे करीब हर साल 124,000 प्लास्टिक कचड़ा नदियों में पहुंचता है।

रिपोर्ट के अनुसार, अमेरिका, जापान और कई यूरोपीय देश प्लास्टिक कचड़ों का सही तरीके से प्रबंधन कर रहे हैं। लेकिन, चीन, इंडोनेशिया, फिलीपींस, थाईलैंड और वियतनाम का कचड़ा समुद्र में बड़ी तादाद में जा रहा है।

इतना खतरनाक है प्लास्टिक कचड़ा

रिपोर्ट के अनुसार, प्लास्टिक कचड़ा टूटता नहीं है, जिससे यह काफी हानिकारक साबित होता है। वहीं कुछ प्लास्टिक ऐसे होते हैं, जो कभी खत्म नहीं होते हैं। वे और छोटे होते जाते हैं। ये छोटे प्लास्टिक कई समुद्री जानवरों और मछलियों द्वारा भोजन समझ खा लिए जाते हैं, जो उनकी सेहत के लिए जानलेवा साबित होते हैं। वहीं नल के पानी में भी ये प्लास्टिक पहुंच जाते हैं।

समुद्री जीवों में मिला प्लास्टिक

समुद्री जीव का मांस (सी-फूड) के मामले में सीप, घोंघों और कौड़ियों में सबसे ज्यादा माइक्रोप्लास्टिक पाया गया है। शोध के अनुसार, घोंघों (मोलस्क) में सबसे ज्यादा मात्रा में माइक्रोप्लास्टिक मिला है, जिसमें प्रतिग्राम माइक्रोप्लास्टिक्स के 10.5 टुकड़े मिले हैं। वहीं क्रसटेशियन जीव (जैसे केकड़ों और झींगा) में प्रति ग्राम माइक्रोप्लास्टिक्स के 0.1 से 8.6 कण मिले हैं, जबकि मछलियों में प्रतिग्राम 2.9 कण तक मिले हैं। यह जानकारी यूनिवर्सिटी ऑफ यॉर्क और हल यूनिवर्सिटी द्वारा किए शोध में सामने आई है। यदि सी-फूड की खपत की बात करें तो हालिया आंकड़ों से पता चला है कि चीन, ऑस्ट्रेलिया, कनाडा, जापान और अमेरिका घोंघो और सीप (मोलस्क) के सबसे बड़े उपभोक्ताओं हैं, इनके बाद यूरोप और यूके का नंबर आता है। 

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