माला दीक्षित, नई दिल्ली। अयोध्या राम जन्मभूमि मामले में पांच न्यायाधीशों की संविधानपीठ के सर्वसम्मति से दिये गए फैसले से कुछ मुस्लिम पक्षकार संतुष्ट नहीं हैं और वे फैसले के खिलाफ पुनर्विचार याचिका दाखिल करने की तैयारी कर रहे हैं। लेकिन सुप्रीम कोर्ट मे पुनर्विचार याचिकाओं पर सुनवाई के जो नियम और प्रक्रिया तय है उसमें पुनर्विचार याचिका मे मुख्य फैसले के बदलने या संशोधित होने की बहुत कम गुंजाइश होती है। ज्यादातर पुनर्विचार याचिकाएं खारिज हो जाती हैं।

सुप्रीम कोर्ट मे पुनर्विचार याचिका दाखिल करने और उस पर सुनवाई की प्रक्रिया तय है। किसी भी फैसले पर आपत्ति या कानूनी खामी होने पर पक्षकारों को फैसले के खिलाफ 30 दिन के भीतर पुनर्विचार याचिका दाखिल करने का अधिकार है। अयोध्या मामले में कुछ मुस्लिम पक्षकारों और आल इंडिया मुस्लिम पर्सनल ला बोर्ड ने पुनर्विचार याचिका दाखिल करने की घोषणा की है। पक्षकारों को हमेशा से ही फैसले के खिलाफ पुनर्विचार याचिका दाखिल करने का अधिकार रहता है।

मुख्य मामले में बोर्ड की ओर से नहीं थी कोई अपील

हालांकि इस मामले मे आल इंडिया मुस्लिम पर्सनल ला बोर्ड पक्षकार नहीं है। मुख्य मामले में बोर्ड की ओर से कोई अपील नहीं थी। लेकिन अयोध्या का यह मुकदमा प्रतिनिधि सूट है ऐसे में बोर्ड फैसले का असर पूरे मुस्लिम समुदाय की आस्था से जुड़ा हुआ बता कर कोर्ट जा सकता है। यह कोर्ट पर निर्भर करेगा कि वह किस हद तक उसकी पुनर्विचार याचिका को स्वीकार करता है।

पुनर्विचार याचिका पर फैसला सुनाने वाले न्यायाधीश करते हैं विचार

पुनर्विचार याचिका पर सुनवाई की तय प्रक्रिया के मुताबिक सुप्रीम कोर्ट अपने फैसले पर तभी पुनर्विचार करता है जबकि फैसले में सीधे तौर पर सामने कोई खामी नजर आ रही हो। इसके अलावा पुनर्विचार याचिका पर वही न्यायाधीश विचार करते हैं जिन्होंने फैसला सुनाया होता है। इस मामले में फैसला सुनाने वाले एक न्यायाधीश जस्टिस रंजन गोगोई सेवानिवृत हो गए है ऐसे में पुनर्विचार याचिकाओं पर सुनवाई के लिए पीठ में जस्टिस गोगोई की जगह किसी नये न्यायाधीश को शामिल किया जाएगा ताकि पांच न्यायाधीशों का कोरम पूरा हो।

मामले को खुली अदालत में लगाने का आदेश किया जाता है पारित 

इसके अलावा पुनर्विचार याचिका पर वही पीठ चैम्बर में सर्कुलेशन के जरिए विचार करती है जिसने मुख्य फैसला दिया होता है। वहां वकीलों की बहस और दलीलें नहीं होती। पीठ के सामने सिर्फ मामले से जुड़े दस्तावेज और रिकार्ड होता है। अगर कोर्ट पुनर्विचार याचिका में उठाए गए मुद्दों से संतुष्ट होता है और उस पर खुली अदालत में सुनवाई की जरूरत समझता है तब मामले को खुली अदालत में लगाने का आदेश पारित किया जाता है, लेकिन ऐसा विरले ही मामलों में होता है।

पुनर्विचार याचिका में नये तथ्य नहीं उठाए जा सकते सिर्फ फैसले की ऐसी कानूनी खामी उजागर करनी होती है जो साफ तौर पर सामने नजर आ रही हो। इन तकनीकियों के कारण बहुत कम मामले ऐसे होते हैं जिसमें कोर्ट पुनर्विचार याचिकाओं में सुनवाई करते हुए अपने पूर्व आदेश को पलटता या बदलता हो।

Posted By: Dhyanendra Singh

अब खबरों के साथ पायें जॉब अलर्ट, जोक्स, शायरी, रेडियो और अन्य सर्विस, डाउनलोड करें जागरण एप